बुधवार, 6 जुलाई 2022

हिंदी में मुस्लिम साहित्यकार, साहित्य के करवानों की रीढ़ हैं

हिंदी में मुस्लिम साहित्यकार साहित्य के करवानों की रीढ़ हैं। बदलता सामाजिक व राजनीतिक अपरिष्कृत पलायनवादी चिंतन मुस्लिम परिवेश में जन्मे रचनाकारों को छिटककर न तो श्रेष्ठ साहित्य की रचना रच पाएंगे और न ही प्रेमचंद पैदा कर पाएंगे और न ही रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी की रुबाई बन पाएंगे । जब भी कोई रसखान जन्मेगा तो भारत में कृष्ण की बांसुरी गूंजेगी ही। राही मासूम रज़ा ही 'महाभारत' को कालजयी बना पायेगा और आग का दरिया (कुर्रतुलऐन हैदर) ही लिख पाएंगीं। ओपेंद्रनाथ अश्क ने एक बार लखनऊ में कहा था,प्रेमचंद ने मुस्लिम लड़कियों को कोठों पर तो पहुंचा दिया, बनारस ने भी अगर संगीत की महान गायकी से मुस्लिम गुरुओं को निकाल दिया तो हिंदी एक दिन अपने-आप मर जाएगी। ग़ालिब बनने के लिए करवानों की रीढ़ बनना पड़ता है, मंटो को ज़िंदा रहना होता है, मुस्लिम साहित्यकारों के योगदान की उपेक्षा से पांवों में छाले पैदा करने पड़ते हैं 'हिंदी में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान' ग्रंथमाला की दूसरी-2022 की कड़ी की एक उभरती कथाकार हैं तबस्सुम जहां। इनके जीवन का अध्ययन किया है, जानी-मानी लेखिका, आलोचक और विदुषी डॉ. अल्पना सुहासिनी ने। --रंजन ज़ैदी, कथाकार, संपादक ********************************************** हिंदी साहित्य में मुस्लिम रचनाकारों के योगदान की जब भी बात चलती है तो हम पाते हैं कि हिंदुस्तानी तहज़ीब वाले इस देश में जहाँ हिन्दी उर्दू या हिंदू मुस्लिम का भेद बहुत गहराई से देखने में नज़र आता हो, उस देश के साहित्य में यह सीमा रेखा खींचना भी एक असाध्य कार्य है। जहां रसखान कृष्ण भक्ति में डूबकर जब लिखते रहे तो साहित्य की बेमिसाल दौलत हमें मिली और न जाने कितने ही मुस्लिम रचनाकारों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। परिस्थितिवश साहित्य के क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम वर्गीकरण कुछ अजीब सा लगता है लेकिन इतिहास की क्रमबद्धता के लिए कई बार कदाचित आवश्यक भी जान पड़ता है। कविता के क्षेत्र में अनेक मुस्लिम कवि हुए जिन्होंने हिन्दी काव्य को समृद्ध किया लेकिन अगर कहानी के क्षेत्र में भी दृष्टि घुमाएं तो भी मुस्लिम कहानीकारों की एक लंबी फेहरिस्त नज़र आती है जिसमें वरिष्ठ कथाकार गुलशेर अहमद खां शानी, राही मासूम रज़ा, असगर वजाहत, नासिरा शर्मा, रंजन ज़ैदी, मंजूर एहतशाम, अब्दुल बिस्मिल्लाह और इब्राहिम शरीफ़ जैसे लेखक हुए तो वहीं दूसरी ओर इस्मत चुगताई और सादत हसन मंटो जैसे लेखकों ने भी हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में अपना भरपूर योगदान दिया। हालांकि कहानी के क्षेत्र में पहला आग़ाज़ सैय्यद इंशा अल्ला खां से भी माना जा सकता है जिनकी कहानी "रानी केतकी की कहानी" को प्रथम कहानी होने का दावा किया जाता है। खैर, वर्तमान कथा साहित्य की अगर बात की जाए तो बहुत गर्व के साथ कहा जा सकता है कि नई पीढ़ी के बहुत से समर्थ रचनाकार इस दिशा में बहुत उम्दा कार्य कर रहे हैं। इसी श्रृंखला में एक नाम है डॉ. तबस्सुम जहां का। हालांकि बहुत से पाठको को शायद यह नाम बिलकुल नया सा लगे लेकिन अगर पाठक तबस्सुम जहां की कहानियां पढ़ना शुरू करेंगे तो अनवरत पढ़ना जारी रखेंगे। असल में कहानीकार अपनी पीढ़ी तथा अपने समाज का आईना होता है क्योंकि समाज में जो घटित हो रहा होता है, वही रचनाओं में झलकता है, बिल्कुल यही खूबी डॉ. तबस्सुम जहां की लघुकथाओं तथा कहानियों में दिखाई देती है। दिल्ली में जन्मी तबस्सुम जहां सात बहन भाइयों में सबसे छोटे से बडी हैं। इनके पिता उच्च संस्कारों वाले उदार व्यक्ति थे जिनका उर्दू भाषा में अच्छा ज्ञान था। बचपन से ही इनको अपने माता-पिता से साम्रदायिक सौहार्द तथा भाईचारे की शिक्षा मिली जो इनकी रचनाओं में भी झलकती है। दुर्भाग्य कहें या नियति का क्रम, सोलह बरस की आयु में इनके पिता का साया इनके सिर से उठ गया। पिता के बाद हुई आर्थिक विसंगतियों ने घर की दशा बदतर कर दी। हालात ऐसे विपरीत हुए कि आर्थिक आभाव के चलते इनकी पढ़ाई बीच मे ही छूट गयी। तीन बरस बाद इनकी पढ़ाई का उत्तरदायित्व इनकी माता ने उठाया और फिर से इनका स्कूल में दाखिला कराया। इस शिक्षा के दूसरे अवसर का तबस्सुम ने भरपूर लाभ उठाया और लगन से पढ़ते हुए बारहवीं कक्षा में 'इंदिरा गाँधी सर्वोत्तम छात्रा' का पुरुस्कार प्राप्त किया। जब यह स्नातक दूसरे वर्ष की परीक्षा दे रही थी तो लंबी बीमारी के चलते इनकी माता भी चल बसीं । माता के जाने से वह इतनी आहत हुईं कि उस बरस की बाक़ी परीक्षा नहीं दे सकीं। इतना ही नहीं, माता की मृत्यु के ठीक पांच दिन बाद वह जिस घर में पैदा हुई, पली बढ़ीं, वह घर भी उनको रिश्तेदारों की उपेक्षा के चलते छोड़ना पड़ा। एक ओर माँ के जाने का दुख तो दूसरी ओर घर छिनने का सदमा। तबस्सुम लगभग टूट सी गयीं। जैसे-तैसे अपने छोटे भाई के साथ अपनी एक मित्र के यहां किराए के घर पर रहीं। थोड़ा संभली तो अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने का फैसला किया। उनकी शिक्षा के प्रति लगन को देखते हुए उनके दोस्तों और जानकारों ने उनकी फीस का प्रबंध किया। समय कटता रहा और अपने छोटे भाई को संभालते, गिरते-पड़ते आखिरकार जामिया मिल्लिया इस्लामिया से ही एम ए, एम फिल तथा पी एच-डी पूरी की। घर में चूंकि उदार व पढ़ा लिखा वातावरण था, अतः कम आयु में ही तबस्सुम ने उर्दू में तुकबंदी लेखन शुरू कर दिया था। अरबी पढ़ने मदरसे जातीं, तब मौलवी साहब को अपना सबक सुना कर बाक़ी समय उनसे छुप कर शेर व ग़ज़ल सरीखी तुकबंदियां कायदे पर ही लिखने लगती। दसवीं तक आते-आते इनका हिंदी भाषा की ओर रुझान बढ़ गया और उन दिनों भारी भरकम पुराने उपमानों व प्रतीकों का प्रयोग करते हुए एक लंबी कविता भी लिख डाली। बारहवीं में कविता लेखन के साथ छोटे-मोटे आलेख भी लिखने लगीं जिसे वह उस समय अपनी अध्यापिकाओं को दिखातीं। उन्हें कविता के क्षेत्र में बड़ा अवसर तब मिला जब उनकी पहली प्रकाशित कविता ' हे ईश्वर' 2013 में' प्रतिष्ठित पत्रिका 'संवदिया' के युवा कविता विशेषांक में छपी। कुछेक दिन बाद ही विश्व पुस्तक मेले के साहित्यिक मंच पर कविता के एक प्रोग्राम में इन्हें कविता सुनाने के लिए बुलाया गया। बस यही दिन था जब इनका बड़े लेखकों व साहित्यकारों से संपर्क हुआ। इनकी दूसरी बड़ी कविता ' ये पत्तियां' लोकस्वामी' पत्रिका में छपी। इतना ही नहीं, उसके बाद वरिष्ठ कवयित्री निर्मला गर्ग ने नए अल्पसंख्यक कवि-कवयित्रियों को प्रकाश में लाने के लिए "दूसरी हिंदी' पुस्तक का संपादन किया। इस संकलन में तबस्सुम जहां की कविताएं भी संकलित हैं। इतना होने पर भी कविताओं में इनका मन नहीं रमा। उनके अनुसार कविताओं में वह स्वयं को बंधा हुआ महसूस कर रही थीं अतः उनका रुझान छोटी कहानी और लघुकथाओं की ओर होने लगा। डॉ तबस्सुम जहां की प्रथम लघुकथा 'औलाद का सुख' दैनिक अखबार 'चौथी दुनिया' मे प्रकाशित हुई जो निर्धन अशिक्षित मुस्लिम समाज की विसंगतियों पर आधारित थी। दूसरी लघुकथा 'सेटिंग' अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' में छपी यह मूलतः लैंगिक विषमता पर केंद्रित थी। सेटिंग रचना पढ़ कर प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक मंगलेश डबराल ने उनसे कहा था कि "तुम्हारी शैली मंटो की तरह है, एकदम सटीक।" तीसरी रचना 'वह जन्नत जाएगी' भी मुस्लिम स्त्री जीवन की विद्रूपताओं पर आधारित थी। चौथी लघुकथा 'लक्ष्मी' मज़दूर स्त्री की समस्याओं को परिलक्षित करती है। उसके बाद लम्बे समय तक उन्होंने कोई रचना नहीं की परन्तु यदा-कदा उनके आलोचनात्मक आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे। जिसमें किन्नर समाज पर आधारित 'सामयिक सरस्वती' में छपा लेख। 'सद्भावना दर्पण' पत्रिका में मशहूर लेखिका 'रजनी मोरवाल' की थर्ड जेंडर पर लिखी कहानी 'पहली बख्शीश' पर लिखी उनकी समीक्षा, उनके द्वारा सामयिक सरस्वती के थर्ड-जेंडर विशेषांक की समीक्षा, 'चौथी दुनिया' समाचार पत्र में राज कुमार राकेश के उपन्यास 'धर्मक्षेत्र' पर लिखी समीक्षा महत्वपूर्ण है। इतना ही नहीं, वरिष्ठ लेखक एवं नाटककार प्रताप सहगल के कहानी संग्रह 'मछली-मछली कितना पानी' पर इनका लिखा लेख 'निज जीवन की तलाश करते लोग।' ब्रिटेन की पत्रिका 'पुरवाई' तथा भारत में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका 'साहित्य मेघ' में प्रकाशित हुआ। कोरोना महामारी में जब पूरी दुनिया भय और त्रासदी के चलते लॉकडाउन की विभीषिका को झेल रही थी, उस समय तबस्सुम जहां संवेदनशील लेखन की ओर उन्मुख हुई। कोरोना तथा लॉक-डाउन विषय पर उनकी प्रत्येक सप्ताह तीन महीने तक सिलसिलेवार लघुकथाएं 'भारत भास्कर' समाचार पत्र में छपीं । कोरोना विषय पर उनकी प्रथम लघुकथा 'कोरोना वायरस' छपी जो एक वर्कर तथा उसके बॉस के अमानवीय संबंधों पर आधारित थी। यह बेहद प्रसिद्ध हुई। इसके अलावा समाज का आईना दिखाती 'भूख और लेबल' निराशा में आशा का संचार करती तथा मानवीय पक्षों को उजागर करती लघुकथा 'क्यों निराश हुआ जाए' व एक हवलदार के भीतरी मार्मिक पक्ष को उकेरती लघुकथा 'रामफल' उस समय सोशल मीडिया पर बहुत सराही गईं। मीडिया की साम्प्रदायिक पक्ष पर उसकी भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगाती लघुकथा 'ईश्वर के दूत' हिन्दू-मुस्लिम-सौहार्द दर्शाती 'देवी माँ' भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कोरोना में सब कुछ बन्द होने से लोग जो जहां थे, वहीं फंस कर रह गए। कुछ लोगों तक सहायता पहुंची तो कुछ के पास नहीं। ऐसी ही भूख और लाचारी से जूझते परिवार की कहानी लघुकथा 'बस दो दिन और' में देखी जा सकती है। लॉक डाउन पर प्रवासी मज़दूरों के पलायन तथा उनके जीवन के दरबदर होने को दिखाती उनकी लघुकथा 'पलायन' बहुत ही प्रसिद्ध हुई। पलायन करते मज़दूरों और उनकी पीड़ादायक यात्रा को सजीव रूप में वर्णन करती उनकी लघुकथा 'बस थोड़ी दूर और' हज़ारों किलोमीटर का कष्टकारी सफर पैदल तय करके गाँव पहुंचे, वहाँ बेरोज़गारी और गरीबी का दंश झेल कर वापस शहर आते बेबस मज़दूरों पर आधारित उनकी मार्मिक लघुकथा "शहर वापसी" एक बारगी पाठकों की आंखे नम कर जाती हैं । कोरोना काल मे हुई प्राइवेट अस्पताओं की लूट खसोट का वर्णन तबस्सुम जहां अपनी लघुकथा 'अपने-अपने भगवान' में करती हैं। 'भूख बनाम साहित्य' कहानी के ज़रिए वे अकादमिक जगत व साहित्य जगत से जुड़े लोगों की असंवेदनशीलता को दिखाती हैं। तबस्सुम जहां सामयिक विषयों पर पैनी नज़र रखती हैं यही कारण है कि उनकी प्रत्येक रचना सामयिक घटनाओ पर आधारित है। ओरंगाबाद में घर वापस जाते मज़दूरों की मालगाड़ी से हुई भीषण वीभत्स दुर्घटना पर आधारित उनकी कहानी 'मौत बेआवाज़ आती है' बड़े राष्ट्रीय अख़बार 'दैनिक भास्कर' के लगभग आधे पृष्ट पर छपी इस कहानी की उन्मुक्त कंठ से वरिष्ठ कवयित्री तथा आलोचक 'निर्मला गर्ग' ने प्रशंसा की तथा नेरेशन की दृष्टि से इस कहानी को बेजोड़ बताया। यह कहानी इतना अधिक प्रसिद्ध हुई कि इस पर बॉलीवुड डायरेक्टर एक्टर प्रतिभा शर्मा ने एक फ़िल्म की स्क्रिप्ट भी लिखी जिसका अभी कार्यान्वन होना बाक़ी है। इसके बाद यह कहानी 'लोकमत' अखबार के दिवाली विशेषांक में भी छपी। अभी हाल में दिनों में जिस प्रकार राजनीति तथा मीडिया द्वारा हिन्दू मुस्लिम खाई को चौड़ा करने का प्रयास किया गया उसके विपरीत तबस्सुम अपनी रचनाओं से इस खाई को भरने का प्रयास कर रही थीं उनकी लघुकथा 'देवी अम्मी की जय' हिन्दू मुस्लिम रिश्ते में मिठास घोलती एक प्यारी सी लघुकथा कही जा सकती है। तबस्सुम जहां ने समाज के तकरीबन हरेक विषय पर अपनी लेखनी चलाई है। स्त्री-जीवन की विसंगतियों पर केंद्रित लघुकथा 'मुक्ति' दांपत्य जीवन पर कटाक्ष करती लघुकथा 'लक़ीर बनाम लकीर' विशेष उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा नौकरी के लिए मौजूदा साक्षत्कार प्रक्रिया की खामियों को उजागर करती इनकी छोटी कहानी 'भूसे की सुई' विदेशी पत्रिका का हिस्सा बन चुकी है। धूम्रपान और उससे होने वाली हानि व लत से जुड़ी विडंबनाओं का सजीव चित्रण 'कैंसर' कहानी में दृष्टिगत होता है जिसमें मित्र की तंबाकू से मौत होने पर भी एक व्यक्ति गुटखा खाना नहीं छोड़ता। आधुनिक समय में जीवन मूल्यों का ह्रास तेज़ी से हो रहा है परिवार में प्रेम आपसी रिश्तों की गर्माहट कम होती जा रही है। ऐसी स्थिति में संतान अपने माता-पिता को छोड़ने में भी नहीं हिचकिचात। उनकी मृत्यु होने पर उनका श्राद्ध करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती हैं। इस विषय पर तबस्सुम जहां की लघुकथा 'फ़र्ज़' बहुत उम्दा बन पड़ी है। बालमन की कोमल भावनाओ तथा उनके मनोविज्ञान का सुंदर चित्रण उनकी बाल कहानी 'कनेर के फूल' तथा 'पानी और आसमान' में देखा जा सकता है। दोनों ही कहानियों में मात्र दो पात्र नौ वर्षीय सुमन और ग्यारह वर्षीय कुसुम दो बहनें हैं जिनकी बालजनित संवाद तथा चेष्टाओं का उल्लेख कहानी में देखने को मिलता है। 'मौत बेआवाज़ आती है' के बाद इनकी दूसरी बड़ी कहानी 'अपने-अपने दायरे' दूसरी सबसे प्रसिद्ध कहानी रही। जो सबसे पहले दैनिक भास्कर अखबार में छपने के बाद ब्रिटेन, कनाडा तथा अमेरिका की बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी है। अपने-अपने दायरे कहानी एक अवकाश प्राप्त अध्यापिका पर केंद्रित है जो लॉकडाउन के समय मे अपनी स्कूल के दिनों की एक छात्रा की आर्थिक सहायता करने बैंक पहुंचती हैं। बैंक के बाहर सोशल डिस्टेंस के कारण बीस गोले बने हुए हैं। हर गोला उन्हें उनकी जीवन स्मृतियों में ले जाता है। अंत मे जीवन के पड़ाव के समान हर गोला पार करके अंततः वह अपनी स्टूडेंट की मदद करने में सफल होती हैं। तबस्सुम जहां को लेखन के दौरान अनेक चुनौतियों का सामना करना पढ़ा। मुस्लिम समाज की विसंगतियों पर लिखी उनकी लघुकथा 'औलाद का सुख' तथा 'वह जन्नत जाएगी' ने अनेक मुस्लिम लोगो को उनके ख़िलाफ़ कर दिया। उनसे कहा गया कि इन्हें इस विपरीत परिस्थितियों में मुस्लिम समाज के ख़िलाफ़ नहीं लिखना चाहिए। दूसरी ओर अकादमिक जगत की पोल खोलती उनकी कहानी भूख बनाम साहित्य को पढ़कर अकादमिक जगत से जुड़े लोगों की नाराजगी प्रकट होने लगी। वहीं साम्रदायिक सौहार्द से जुड़ी उनकी अभी हाल की लघुकथा 'धर्म की रक्षा' पढकर सोशल मीडिया पर कुछ लोग ने आपत्ति की कि उन्होंने हिन्दू धर्म को मुद्दा क्यों बनाया किसी मुस्लिम को क्यों नहीं। इन सब विरोधों के बावजूद तबस्सुम जहां अनवरत रचना कर्म कर रही हैं। आज जिस प्रकार समाज मे हिन्दू मुस्लिम खाई चौडा हो रही है इसमें एक स्त्री होना वो भी मुस्लिम लेखिका होना तबस्सुम स्वयं मे एक चुनौती मानती है। तबस्सुम जहां की कहानियां पर यदि समीक्षा तथा आलोचनात्मक दृष्टि से बात करें तो हम पाते हैं कि उनकी छोटी बड़ी सभी कहानियाँ बात करती हैं वर्तमान परिदृश्य की, गरीबी की, असंतुलन की, असमानता की, धर्म के नाम पर बढ़ती कट्टरता की। कोरोना जैसी भयंकर महामारी से जिस तरह से पूरे विश्व में तांडव मचा वह हम सबने देखा तो रचनाकार इससे भला अछूते कैसे रहते वो भी तबस्सुम जहां जैसे सहृदय रचनाकार जिनकी कलम से हमेशा ही गरीबों का और मजलूमों का दर्द उकेरा गया। जहां उनकी "कोरोना वायरस " कहानी समाज में बढ़ती संवेदनहीनता की ओर इशारा करती है वहीं लोगो की उम्मीद को बचाए रखने का काम करती है उनकी कहानी "क्यों निराश हुआ जाए।" इसी तरह से उनकी कहानी "अपने अपने दायरे" के जरिए हमें रिटायरमेंट के वाद की सामाजिक अस्वीकृति और पारिवारिक उपेक्षा से जूझते दंपत्ति और कोरोना के लिए बने दायरों के माध्यम से अपनी हर उम्र के दायरों की स्मृतियों में घिरे दंपत्ति का मार्मिक चित्रण है। तबस्सुम लघुकथाएं तथा छोटी कहानियां लिखती हैं और संक्षिप्त्तता में बड़ी बात कहना उनका हुनर है। कम शब्दों तथा छोटे संवाद उनकी कहानियों की जान है जो उनकी रचनाओं को एक ग़ज़ब की कसावट देते हैं। उनकी रचनाओं में कहीं कोई बिखराव नज़र नहीं आता और इनका नेरेशन कमाल का होता है। उनकी कहानियां चित्रात्मक शैली में रचित होती हैं जिन्हें पढ़ कर लगता है कि सभी दृश्य आँखों के सामने सजीव हो उठते हों।ग्रामीण परिवेश की उनकी रचनाएं जैसे ईश्वर के दूत, देवी माँ, देवी अम्मी की जय, शहर वापसी, बस थोड़ी दूर और, बस दो दिन और तथा मौत बेआवाज़ आती है में उनकी बोलचाल की ग्रामीण क्षेत्रीय बोली मन को मोह लेती हैं। वहीं शहरी पृष्ठभूमि पर रचित कहानी अपने-अपने दायरे, मुक्ति, फ़र्ज़, अपने-अपने भगवान, भूख बनाम साहित्य, शहरी वातवरण को जीवित करती है। इनकी प्रत्येक कहानी की भाषा पात्रानुकूल है। व्यर्थ के भारी भरकम शब्दों से लेखिका ने गुरेज़ किया है। कहानी के शिल्प की कसौटी पर उनकी कहानियां एकदम खरी उतरती हैं। तबस्सुम जी स्वयं भी एक बहुत उम्दा समीक्षक हैं और उनकी फिल्मों की समीक्षाएं अकसर राष्ट्रीय अखबारों में प्रकाशित होती रहती हैं। साथ ही वे बॉलिवुड इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल जैसे सार्थक मंच की पब्लिक प्रवक्ता भी हैं। इसके अलावा यह अंतर्राष्ट्रीय हिंदी मासिक पत्रिका 'साहित्य मेघ' की सह संपादक के पद पर हैं और निरंतर साहित्य सेवा कर रही हैं। तबस्सुम जहां का हिंदी कहानी में महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए वरिष्ठ आलोचक प्रसिद्ध नाटककार कहानीकार प्रताप सहगल ने तबस्सुम जहां को "एक उम्दा कथाकार माना है।" इतना ही नहीं प्रसिद्ध आलोचक समीक्षक राजेन्द्र श्रीवास्तव ने हिंदी कथा साहित्य पर लिखी व सामयिक प्रकाशन से छपी पुस्तक में तबस्सुम जहां को नए उभरते कथाकारों में शामिल किया है वे अपनी पुस्तक " सृजन का उत्सव- हिंदी कहानी का सरल और संक्षिप्त इतिहास" में लिखते हैं कि "अपने समय की विसंगतियों को डॉ तबस्सुम जहां अपनी छोटी छोटी कहानियों के माध्यम से बहुत प्रभावी रूप से व्यक्त कर रही हैं। लेखिका संवेदना के स्पर्श से साधारण अनुभूतियों को भी असाधारण बना देती हैं। उनकी रचनाएं दुनिया को बेहतर बनाने का प्रतिफल नज़र आती हैं। देवी अम्मी की जय, अपने अपने भगवान, बस थोड़ी दूर और जैसी रचनाएं लेखिका के मानवतावादी चिंतन को अभिव्यक्त करती हैं।" अतः इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि तबस्सुम जहां हिंदी साहित्य जगत में एक उभरता हुआ हस्ताक्षर बनने की ओर अग्रस हैं। इनकी कहानियां न केवल देश भर की पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं वरन विदेशों की पत्रिकाओं में भी उनकी कहानियां निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं। Spotify जैसे ऑनलाईन रेडियो के माध्यम से भी उनकी कहानियों का पाठ हुआ है। तबस्सुम जहां की कहानियां की शिल्प पर बात करें रचनाधर्मिता का मूल तत्त्व है संवेदना और उससे आगे बढकर बाकी सभी शिल्पगत तत्त्व आते हैं लेकिन अगर कोइ रचना शिल्प की कसौटी पर भी खरी हो तो उसका गठाव पाठकों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है। डॉ। तबस्सुम चूंकि खुद बहुत अच्छी विश्लेषक और समीक्षक भी हैं इसलिए वे अपनी रचनाधर्मिता के साथ भी पूरा न्याय कर पाती हैं लेकिन साथ ही साथ उन्होंने कहानियों की रोचकता को भी बरकरार रखा है क्योंकि किसी भी पाठक के लिए रचना का रोचक होना बहुत जरुरी है और वह कहीं भी बोझिल नहीं होनी चहिए। तबस्सुम जी की कहानियां इन सभी मापदंडों पर पूर्णरूपेण खरी उतरती हैं और कहीं भी निराश नहीं करती हैं। तबस्सुम जहां के समस्त रचनाकर्म पर दृष्टिपात कर ये कहा जा सकता है कि वे असीमित संभावनाओं वाली रचनाकार हैं और आने वाले समय में हमें उनकी और और कहानियों का शिद्दत से इंतज़ार रहेगा। इनके लेखन की एक ख़ास बात और है कि वे क्वांटिटी की बनिस्बत क्वालिटी में यकीन रखती हैं और निरन्तर लेखन की किसी तरह की दौड़ में शामिल नहीं हैं और भीड़ से अलग रहना ही उनके व्यक्तित्व की भी विशिष्टता है। उनकी रचनाओं में क्षेत्रीयता और आंचलिकता की भीनी भीनी महक भी मिलती है जो उन्हें औरों से इतर खड़ा करती है। अतः इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि तबस्सुम जहां हिंदी साहित्य में एक उभरता हुआ नाम हैं। इनकी रचनाधर्मिता आगे आने वाले समय में हिंदी साहित्य में अभूतपूर्व योगदान देगी ऐसा मेरा विश्वास है। मुस्लिम महिला कथाकार होते हुए भी यह अपने समाज की विद्रूपताओं का बेबाक चित्रण करती हैं। तबस्सुम जहां ने एक बातचीत के दौरान मुझसे कहा था कि "सुहासिनी जी मैं साहित्य को हृदय के गहराई की उदभावना का मूर्त रूप मानती हूं। लेकिन इसे व्यक्त करने में कई उलझनों से गुजरना पड़ता है।एक स्त्री होने के नाते ख़ासकर मुस्लिम स्त्री होने के कारण कई चीज़ों को व्यक्त करना मुश्किल होता है। यह सामाजिक धार्मिक और आर्थिक आज़ादी न होने के कारण होता है। लेकिन हालात से लड़ना ही मेरा ध्येय है।" उनके इन विचारों से सृजनात्मक विसंगतियों का समझा जा सकता है। वह प्रगतिशील रही हैं यह उनके पारिवारिक संस्कारों की देन है। एक बार जब वह घरलू जरूरत के लिए पानी लेने मस्जिद में गई तो मौलाना ने यह कह कर मना कर दिया कि स्त्री का प्रवेश यहां नही हो सकता। अगली बार मौलाना जब चंदा मांगने उनके घर पहुंचे तब तबस्सुम ने चंदा देने से साफ मना कर दिया। इतनी छोटी उम्र में धर्म को लेकर ऐसा फ़ैसला प्रगतिशील होने के कारण ही वह ले सकी। युवा कथाकार के रूप में उनकी रचनात्मकता में जो धार दिखाई देती है वह अपने आसपास की विसंगतियों को हृदय से महसूस करने के कारण ही है।समाज से राजनीति तक और राजनीति से स्त्री जीवन तक जो विद्रूपताएं दिखाई देती है तबस्सुम जहां उसकी प्रबल विरोधी नजर आती हैं । इनकी कहानी का नायक जब संवाद बोलता है तो उसके संवाद में एक व्यंग्य मिश्रित ध्वनि स्पष्ट होती है यह उनके लेखन में अनुभूतियों के कारण ही है। स्त्री स्वयं में विसंगतियों से जूझती रहती है लेकिन इसके साथ उसका जीवन भी एक सृजनात्मक भावबोध में लिपटा रहता है अपने इसी क्षमता का उपयोग जो स्त्री कर लेती है वह स्वयं को साबित कर पाती है। तस्लीमा नसरीन से लेकर शाजिया तबस्सुम तक और शाजिया तबस्सुम से तबस्सुम जहां तक के कथा सृजन में सृजनात्मकता को पहचान कर पहचान बनाती स्त्री के भावगत उद्बोध का समझा जा सकता है। इतना अवश्य है कि अपने पूर्ववर्ती मुस्लिम साहित्यकारों के समान निर्दयता से यह विसंगतियों पर चोट नही करती हैं।बावजूद इसके इनके लेखन की धार हमारे भावनाओं को उद्देलित करने में सक्षम सिद्ध होती है। --------------------------------------------------------- जीवन परिचय डॉ अल्पना सुहासिनी युवा आलोचक एवं समीक्षक हैं। देश विदेश की पत्र पत्रिकाओं में उनके लेख तथा ग़ज़ले निरंतर छपती रहती हैं। इनका ग़ज़ल संग्रह "तेरे मेरे लब की बात" काफ़ी चर्चित रहा है। साहित्य साधना के अलावा यह साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों व गोष्ठियों का सफल संचालन करती हैं। इसके अलावा बॉलीवुड एक्टर, उम्दा एंकर तथा एक मशहूर ग़ज़लकार भी हैं। अटैचमेंट क्षेत्र हिंदी साहित्य में मुस्लिम रचनाकारों के योगदान की जब भी बात चलती है तो हम पाते हैं कि हिंदुस्तानी तहज़ीब वाले इस देश में जहाँ हिन्दी उर्दू या हिंदू मुस्लिम का भेद बहुत गहराई से देखने में नज़र आता हो उस देश के साहित्य में यह सीमा रेखा खींचना भी एक असाध्य कार्य है। जहां रसखान कृष्ण भक्ति में डूबकर जब लिखते रहे तो साहित्य की बेमिसाल दौलत हमें मिली और न जाने कितने ही मुस्लिम रचनाकारों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। हालांकि साहित्य के क्षेत्र में हिंदू मुस्लिम वर्गीकरण अजीब लगता है लेकिन इतिहास की क्रमबद्धता के लिए कई बार आवश्यक भी जान पड़ता है। कविता के क्षेत्र में अनेक मुस्लिम कवि हुए जिन्होंने हिन्दी काव्य को समृद्ध किया लेकिन अगर कहानी के क्षेत्र में भी दृष्टि घुमाएं तो भी मुस्लिम कहानीकारों की एक लंबी फेहरिस्त नज़र आती है जिसमे अब्दुल बिस्मिल्लाह, शानी, राही मासूम रज़ा, मंजूर एहतशाम, असद ज़ैदी, रंजन ज़ैदी, इब्राहिम शरीफ़ असगर वजाहत जैसे लेखक हुए तो वहीं दूसरी ओर इस्मत चुगताई, नासिरा शर्मा जैसी लेखिकाओं ने हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में अपना भरपूर योगदान दिया। हालांकि कहानी के क्षेत्र में पहला आग़ाज़ एक मुस्लिम यानी "सैय्यद इंशा अल्ला खां" से भी माना जा सकता है जिनकी कहानी "रानी केतकी की कहानी" को प्रथम कहानी होने का दावा किया जाता है। खैर, वर्तमान कथा साहित्य की अगर बात की जाए तो बहुत गर्व के साथ कहा जा सकता है कि नई पीढ़ी के बहुत से समर्थ रचनाकार इस दिशा में बहुत उम्दा कार्य कर रहे हैं। इसी श्रृंखला में एक नाम है डॉ. तबस्सुम जहां का। हालांकि बहुत से पाठको को शायद यह नाम नया लगे लेकिन अगर पाठक तबस्सुम जहां की कहानियां पढ़ना शुरु हो करेंगे तो पढ़ते ही चले जायेंगे। असल में कहानीकार अपनी पीढ़ी तथा अपने समाज का आइना होता है क्योंकि समाज में जो घटित हो रहा होता है वही रचनाओं में झांकता है बिल्कुल यही खूबी डॉ. तबस्सुम जहां की लघुकथाओं तथा कहानियों में दिखती है। दिल्ली में जन्मी तबस्सुम सात बहन भाइयों में सबसे छोटे से बडी हैं। इनके पिता उच्च संस्कारों वाले उदार व्यक्ति थे जिनका उर्दू भाषा में अच्छा ज्ञान था। बचपन से ही इनको अपने माता-पिता से साम्रदायिक सौहार्द तथा भाईचारे की शिक्षा मिली। जो इनकी रचनाओं में भी झलकती है। सोलह बरस की आयु में इनके पिता का साया इनके सिर से उठ गया। पिता के बाद हुई आर्थिक विसंगतियों ने घर की दशा बदतर कर दी। हालात ऐसे विपरीत हुए कि आर्थिक आभाव के चलते इनकी पढ़ाई बीच मे ही छूट गयी। तीन बरस बाद इनकी पढ़ाई का उत्तरदायित्व इनकी माता ने उठाया और फिर से इनका स्कूल में दाखिला कराया। इस शिक्षा के दूसरे अवसर का तबस्सुम ने भरपूर लाभ उठाया और लगन से पढ़ते हुए बारहवीं कक्षा में 'इंदिरा गाँधी सर्वोत्तम छात्रा' का पुरुस्कार प्राप्त किया। जब यह स्नातक दूसरे वर्ष की परीक्षा दे रही थी तो लंबी बीमारी के चलते इनकी माता भी चल बसी। माता के जाने से वह इतनी आहत हुईं कि उस बरस की बाक़ी परीक्षा नहीं दे सकीं। इतना ही नहीं, माता की मृत्यु के ठीक पांच दिन बाद वह जिस घर मे पैदा हुई, पली बडीं वह घर भी उनको रिश्तेदारों की उपेक्षा के चलते छोड़ना पढ़ा। एक ओर माँ के जाने का दुख दूसरी ओर घर छिनने का आघात। तबस्सुम लगभग टूट सी गयीं। जैसे-तैसे अपने छोटे भाई के साथ अपनी एक मित्र के यहां किराए के घर पर रहीं। थोड़ा संभली तो अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने का फैसला किया। उनकी शिक्षा के प्रति लगन को देखते हुए उनके दोस्तों ने उनकी फीस का जुगाड़ किया। समय कटता रहा और अपने छोटे भाई को संभालते गिरते पढ़ते आखिरकार जामिया मिल्लिया इस्लामिया से ही एम ए, एम फिल तथा पी एच डी पूरी की। घर मे चूंकि उदार व पढ़ा लिखा वातावरण था अतः कम आयु में ही तबस्सुम ने उर्दू में तुकबंदी लेखन शुरू कर दिया था। अरबी पढ़ने मदरसे जाती तब मौलवी साहब को अपना सबक सुना कर बाक़ी समय उनसे छुप कर शेर व ग़ज़ल सरीखी तुकबंदियां कायदे पर ही लिखने लगती। दसवीं तक आते-आते इनका हिंदी भाषा की ओर रुझान बढ़ा और उन दिनों भारी भरकम पुराने उपमानों व प्रतीकों का प्रयोग करते हुए एक लंबी कविता लिख डाली। बारहवीं में कविता लेखन के साथ छोटे मोटे आलेख भी लिखने लगीं जिसे वह उस समय अपनी अध्यापिकाओं को दिखातीं। उन्हें कविता के क्षेत्र में बड़ा अवसर तब मिला जब उनकी पहली प्रकाशित कविता ' हे ईश्वर' 2013 में' प्रतिष्ठित पत्रिका 'संवदिया' के युवा कविता विशेषांक में छपी। कुछेक दिन बाद ही विश्व पुस्तक मेले के साहित्यिक मंच पर कविता के एक प्रोग्राम में इन्हें कविता सुनाने के लिए बुलाया गया। बस यही दिन था जब इनका बड़े लेखकों व साहित्यकारों से संपर्क हुआ। इनकी दूसरी बड़ी कविता ' ये पत्तियां' लोकस्वामी' पत्रिका में छपी। इतना ही नहीं, उसके बाद वरिष्ठ कवयित्री निर्मला गर्ग ने नए अल्पसंख्यक कवि कवयित्रियों को प्रकाश में लाने के लिए "दूसरी हिंदी' पुस्तक का संपादन किया। इस संकलन में तबस्सुम जहां की कविताएं भी संकलित हैं। पर इतना होने पर भी कविताओं में इनका मन नहीं रमा। उनके अनुसार कविताओं में वह स्वयं को बंधा हुआ महसूस कर रही थीं अतः उनका रुझान छोटी कहानी और लघुकथाओं की ओर होने लगा। डॉ तबस्सुम जहां की प्रथम लघुकथा 'औलाद का सुख' दैनिक अखबार 'चौथी दुनिया' मे प्रकाशित हुई जो निर्धन अशिक्षित मुस्लिम समाज की विसंगतियों पर आधारित थी। दूसरी लघुकथा 'सेटिंग' अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' में छपी यह मूलतः लैंगिक विषमता पर केंद्रित थी। सेटिंग रचना पढ़ कर प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक मंगलेश डबराल जी ने उनसे कहा था कि "तुम्हारी शैली मंटो की तरह है एकदम सटीक।" तीसरी रचना 'वह जन्नत जाएगी' भी मुस्लिम स्त्री जीवन की विद्रूपताओं पर आधारित थी। चौथी लघुकथा 'लक्ष्मी' मज़दूर स्त्री की समस्याओं को परिलक्षित करती है। उसमे बाद लम्बे समय तक उन्होंने कोई रचना नहीं की परन्तु यदा कदा उनके आलोचनात्मक आलेख विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे। जिसमें किन्नर समाज पर आधारित 'सामयिक सरस्वती' में छपा लेख। 'सद्भावना दर्पण' पत्रिका में मशहूर लेखिका 'रजनी मोरवाल' की थर्ड जेंडर पर लिखी कहानी 'पहली बख्शीश' पर लिखी उनकी समीक्षा, उनके द्वारा सामयिक सरस्वती के थर्ड जेंडर विशेषांक की समीक्षा, 'चौथी दुनिया' समाचार पत्र में राज कुमार राकेश के प्रसिद्ध उपन्यास 'धर्मक्षेत्र' पर लिखी समीक्षा महत्वपूर्ण है। इतना ही नहीं वरिष्ठ लेखक एवं नाटकार प्रताप सहगल के कहानी संग्रह 'मछली मछली कितना पानी' पर इनका लिखा लेख 'निज जीवन की तलाश करते लोग।' ब्रिटेन की पत्रिका 'पुरवाई' तथा भारत में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका 'साहित्य मेघ' में प्रकाशित हुआ। कोरोना महामारी में जब पूरी दुनिया भय और त्रासदी के चलते लॉकडाउन की विभीषिका को झेल रही थी उस समय तबस्सुम जहां संवेदनशील लेखन की ओर उन्मुख हुईं कोरोना तथा लॉक डाउन विषय पर उनकी प्रत्येक सप्ताह तीन महीने तक सिलसिलेवार लघुकथाएं 'भारत भास्कर' समाचार पत्र में छपी। कोरोना विषय पर उनकी प्रथम लघुकथा 'कोरोना वायरस' छपी जो एक वर्कर तथा उसके बॉस के अमानवीय संबंधों पर आधारित थी। यह बेहद प्रसिद्ध हुई। इसके अलावा समाज का आईना दिखाती 'भूख और लेबल' निराशा में आशा का संचार करती तथा मानवीय पक्षों को उजागर करती लघुकथा 'क्यों निराश हुआ जाए' व एक हवलदार के भीतरी मार्मिक पक्ष को उकेरती लघुकथा 'रामफल' उस समय सोशल मीडिया पर बहुत सराही गईं। मीडिया की साम्प्रदायिक पक्ष पर उसकी भूमिक पर प्रश्न चिन्ह लगाती लघुकथा 'ईश्वर के दूत' हिन्दू मुस्लिम सौहार्द दर्शाती 'देवी माँ' भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कोरोना में सब कुछ बन्द होने से लोग जो जहां थे वहीं फंस कर रह गए। कुछ लोगो तक सहायता पहुंची तो कुछ के पास नहीं। ऐसी ही भूख और लाचारी से जूझते परिवार की कहानी लघुकथा 'बस दो दिन और' में देखी जा सकती है। लॉक डाउन पर प्रवासी मज़दूरों के पलायन तथा उनके जीवन के दरबदर होने को दिखाती उनकी लघुकथा 'पलायन' बहुत ही प्रसिद्ध हुई। पलायन करते मज़दूरों और उनकी पीड़ा दायक यात्रा को सजीव रूप में वर्णन करती उनकी लघुकथा 'बस थोड़ी दूर ओर' हज़ारों किलोमीटर का कष्टकारी सफर पैदल तय करके गाँव पहुंचे वहाँ बेरोज़गारी और गरीबी का दंश झेल कर वापस शहर आते बेबस मज़दूरों पर आधारित उनकी मार्मिक लघुकथा "शहर वापसी" एक बारगी पाठकों की आंखे नम कर जाती है। कोरोना काल मे हुई प्राइवेट अस्पताओं की लूट खसोट का वर्णन तबस्सुम जहां अपनी लघुकथा 'अपने-अपने भगवान' में करती हैं। 'भूख बनाम साहित्य' कहानी के ज़रिए वे अकादमिक जगत व साहित्य जगत से जुड़े लोगों की असंवेदनशीलता को दिखाती हैं। तबस्सुम जहां सामयिक विषयों पर पैनी नज़र रखती हैं यही कारण है कि उनकी प्रत्येक रचना सामयिक घटनाओ पर आधारित है। ओरंगाबाद में घर वापस जाते मज़दूरों की मालगाड़ी से हुई भीषण वीभत्स दुर्घटना पर आधारित उनकी कहानी 'मौत बेआवाज़ आती है' बड़े राष्ट्रीय अख़बार 'दैनिक भास्कर' के लगभग आधे पृष्ट पर छपी इस कहानी की उन्मुक्त कंठ से वरिष्ठ कवयित्री तथा आलोचक 'निर्मला गर्ग' ने प्रशंसा की तथा नेरेशन की दृष्टि से इस कहानी को बेजोड़ बताया। यह कहानी इतना अधिक प्रसिद्ध हुई कि इस पर बॉलीवुड डायरेक्टर एक्टर प्रतिभा शर्मा ने एक फ़िल्म की स्क्रिप्ट भी लिखी जिसका अभी कार्यान्वन होना बाक़ी है। इसके बाद यह कहानी 'लोकमत' अखबार के दिवाली विशेषांक में भी छपी। अभी हाल में दिनों में जिस प्रकार राजनीति तथा मीडिया द्वारा हिन्दू मुस्लिम खाई को चौड़ा करने का प्रयास किया गया उसके विपरीत तबस्सुम अपनी रचनाओं से इस खाई को भरने का प्रयास कर रही थीं उनकी लघुकथा 'देवी अम्मी की जय' हिन्दू मुस्लिम रिश्ते में मिठास घोलती एक प्यारी सी लघुकथा कही जा सकती है। तबस्सुम जहां ने समाज के तकरीबन हरेक विषय पर अपनी लेखनी चलाई है। स्त्री जीवन की विसंगतियों पर केंद्रित लघुकथा 'मुक्ति' दांपत्य जीवन पर कटाक्ष करती लघुकथा 'लक़ीर बनाम लकीर' विशेष उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा नौकरी के लिए मौजूदा साक्षत्कार प्रक्रिया की खामियों को उजागर करती इनकी छोटी कहानी 'भूसे की सुई' विदेशी पत्रिका का हिस्सा बन चुकी है। धूम्रपान और उससे होने वाली हानि व लत से जुड़ी विडंबनाओं का सजीव चित्रण 'कैंसर' कहानी में दृष्टिगत होता है जिसमे मित्र की तंबाकू से मौत होने पर भी एक व्यक्ति गुटखा खाना नहीं छोड़ता। आधुनिक समय में जीवन मूल्यों का ह्रास तेज़ी से हो रहा है परिवार में प्रेम आपसी रिश्तों की गर्माहट कम होती जा रही है। ऐसी स्थिति में संतान अपने माता पिता को छोड़ने में भी नहीं हिचकिचाती। और उनकी मृत्यु होने पर उनका श्राद्ध करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती हैं। इस विषय पर तबस्सुम जहां की लघुकथा 'फ़र्ज़' बहुत उम्दा बन पड़ी है। बाल मन की कोमल भावनाओ तथा उनके मनोविज्ञान का सुंदर चित्रण उनकी बाल कहानी 'कनेर के फूल' तथा 'पानी और आसमान' में देखा जा सकता है। दोनों ही कहानियों में मात्र दो पात्र नौ वर्षीय सुमन और ग्यारह वर्षीय कुसुम दो बहनें हैं। जिनकी बालजनित संवाद तथा चेष्टाओं का उल्लेख कहानी में देखने को मिलता है। 'मौत बेआवाज़ आती है' के बाद इनकी दूसरी बड़ी कहानी 'अपने-अपने दायरे' दूसरी सबसे प्रसिद्ध कहानी रही। जो सबसे पहले दैनिक भास्कर अखबार में छपने के बाद ब्रिटेन, कनाडा तथा अमेरिका की बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी है। अपने-अपने दायरे कहानी एक अवकाश प्राप्त अध्यापिका पर केंद्रित है जो लॉकडाउन के समय मे अपनी स्कूल के दिनों की एक छात्रा की आर्थिक सहायता करने बैंक पहुंचती हैं। बैंक के बाहर सोशल डिस्टेंस के कारण बीस गोले बने हुए हैं। हर गोला उन्हें उनकी जीवन स्मृतियों में ले जाता है। अंत मे जीवन के पड़ाव के समान हर गोला पार करके अंततः वह अपनी स्टूडेंट की मदद करने में सफल होती हैं। तबस्सुम जहां को लेखन के दौरान अनेक चुनौतियों का सामना करना पढ़ा। मुस्लिम समाज की विसंगतियों पर लिखी उनकी लघुकथा 'औलाद का सुख' तथा 'वह जन्नत जाएगी' ने अनेक मुस्लिम लोगो को उनके ख़िलाफ़ कर दिया। उनसे कहा गया कि इन्हें इस विपरीत परिस्थितियों में मुस्लिम समाज के ख़िलाफ़ नहीं लिखना चाहिए। दूसरी ओर अकादमिक जगत की पोल खोलती उनकी कहानी भूख बनाम साहित्य को पढ़कर अकादमिक जगत से जुड़े लोगों की नाराजगी प्रकट होने लगी। वहीं साम्रदायिक सौहार्द से जुड़ी उनकी अभी हाल की लघुकथा 'धर्म की रक्षा' पढकर सोशल मीडिया पर कुछ लोग ने आपत्ति की कि उन्होंने हिन्दू धर्म को मुद्दा क्यों बनाया किसी मुस्लिम को क्यों नहीं। इन सब विरोधों के बावजूद तबस्सुम जहां अनवरत रचना कर्म कर रही हैं। आज जिस प्रकार समाज मे हिन्दू मुस्लिम खाई चौडा हो रही है इसमें एक स्त्री होना वो भी मुस्लिम लेखिका होना तबस्सुम स्वयं मे एक चुनौती मानती है। तबस्सुम जहां की कहानियां पर यदि समीक्षा तथा आलोचनात्मक दृष्टि से बात करें तो हम पाते हैं कि उनकी छोटी बड़ी सभी कहानियाँ बात करती हैं वर्तमान परिदृश्य की, गरीबी की, असंतुलन की, असमानता की, धर्म के नाम पर बढ़ती कट्टरता की। कोरोना जैसी भयंकर महामारी से जिस तरह से पूरे विश्व में तांडव मचा वह हम सबने देखा तो रचनाकार इससे भला अछूते कैसे रहते वो भी तबस्सुम जहां जैसे सहृदय रचनाकार जिनकी कलम से हमेशा ही गरीबों का और मजलूमों का दर्द उकेरा गया। जहां उनकी "कोरोना वायरस " कहानी समाज में बढ़ती संवेदनहीनता की ओर इशारा करती है वहीं लोगो की उम्मीद को बचाए रखने का काम करती है उनकी कहानी "क्यों निराश हुआ जाए।" इसी तरह से उनकी कहानी "अपने अपने दायरे" के जरिए हमें रिटायरमेंट के वाद की सामाजिक अस्वीकृति और पारिवारिक उपेक्षा से जूझते दंपत्ति और कोरोना के लिए बने दायरों के माध्यम से अपनी हर उम्र के दायरों की स्मृतियों में घिरे दंपत्ति का मार्मिक चित्रण है। तबस्सुम लघुकथाएं तथा छोटी कहानियां लिखती हैं और संक्षिप्त्तता में बड़ी बात कहना उनका हुनर है। कम शब्दों तथा छोटे संवाद उनकी कहानियों की जान है जो उनकी रचनाओं को एक ग़ज़ब की कसावट देते हैं। उनकी रचनाओं में कहीं कोई बिखराव नज़र नहीं आता और इनका नेरेशन कमाल का होता है। उनकी कहानियां चित्रात्मक शैली में रचित होती हैं जिन्हें पढ़ कर लगता है कि सभी दृश्य आँखों के सामने सजीव हो उठते हों।ग्रामीण परिवेश की उनकी रचनाएं जैसे ईश्वर के दूत, देवी माँ, देवी अम्मी की जय, शहर वापसी, बस थोड़ी दूर और, बस दो दिन और तथा मौत बेआवाज़ आती है में उनकी बोलचाल की ग्रामीण क्षेत्रीय बोली मन को मोह लेती हैं। वहीं शहरी पृष्ठभूमि पर रचित कहानी अपने-अपने दायरे, मुक्ति, फ़र्ज़, अपने-अपने भगवान, भूख बनाम साहित्य, शहरी वातवरण को जीवित करती है। इनकी प्रत्येक कहानी की भाषा पात्रानुकूल है। व्यर्थ के भारी भरकम शब्दों से लेखिका ने गुरेज़ किया है। कहानी के शिल्प की कसौटी पर उनकी कहानियां एकदम खरी उतरती हैं। तबस्सुम जी स्वयं भी एक बहुत उम्दा समीक्षक हैं और उनकी फिल्मों की समीक्षाएं अकसर राष्ट्रीय अखबारों में प्रकाशित होती रहती हैं। साथ ही वे बॉलिवुड इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल जैसे सार्थक मंच की पब्लिक प्रवक्ता भी हैं। इसके अलावा यह अंतर्राष्ट्रीय हिंदी मासिक पत्रिका 'साहित्य मेघ' की सह संपादक के पद पर हैं और निरंतर साहित्य सेवा कर रही हैं। तबस्सुम जहां का हिंदी कहानी में महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए वरिष्ठ आलोचक प्रसिद्ध नाटककार कहानीकार प्रताप सहगल ने तबस्सुम जहां को "एक उम्दा कथाकार माना है।" इतना ही नहीं प्रसिद्ध आलोचक समीक्षक राजेन्द्र श्रीवास्तव ने हिंदी कथा साहित्य पर लिखी व सामयिक प्रकाशन से छपी पुस्तक में तबस्सुम जहां को नए उभरते कथाकारों में शामिल किया है वे अपनी पुस्तक " सृजन का उत्सव- हिंदी कहानी का सरल और संक्षिप्त इतिहास" में लिखते हैं कि "अपने समय की विसंगतियों को डॉ तबस्सुम जहां अपनी छोटी छोटी कहानियों के माध्यम से बहुत प्रभावी रूप से व्यक्त कर रही हैं। लेखिका संवेदना के स्पर्श से साधारण अनुभूतियों को भी असाधारण बना देती हैं। उनकी रचनाएं दुनिया को बेहतर बनाने का प्रतिफल नज़र आती हैं। देवी अम्मी की जय, अपने अपने भगवान, बस थोड़ी दूर और जैसी रचनाएं लेखिका के मानवतावादी चिंतन को अभिव्यक्त करती हैं।" अतः इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि तबस्सुम जहां हिंदी साहित्य जगत में एक उभरता हुआ हस्ताक्षर बनने की ओर अग्रस हैं। इनकी कहानियां न केवल देश भर की पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं वरन विदेशों की पत्रिकाओं में भी उनकी कहानियां निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं। Spotify जैसे ऑनलाईन रेडियो के माध्यम से भी उनकी कहानियों का पाठ हुआ है। तबस्सुम जहां की कहानियां की शिल्प पर बात करें रचनाधर्मिता का मूल तत्त्व है संवेदना और उससे आगे बढकर बाकी सभी शिल्पगत तत्त्व आते हैं लेकिन अगर कोइ रचना शिल्प की कसौटी पर भी खरी हो तो उसका गठाव पाठकों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है। डॉ। तबस्सुम चूंकि खुद बहुत अच्छी विश्लेषक और समीक्षक भी हैं इसलिए वे अपनी रचनाधर्मिता के साथ भी पूरा न्याय कर पाती हैं लेकिन साथ ही साथ उन्होंने कहानियों की रोचकता को भी बरकरार रखा है क्योंकि किसी भी पाठक के लिए रचना का रोचक होना बहुत जरुरी है और वह कहीं भी बोझिल नहीं होनी चहिए। तबस्सुम जी की कहानियां इन सभी मापदंडों पर पूर्णरूपेण खरी उतरती हैं और कहीं भी निराश नहीं करती हैं। तबस्सुम जहां के समस्त रचनाकर्म पर दृष्टिपात कर ये कहा जा सकता है कि वे असीमित संभावनाओं वाली रचनाकार हैं और आने वाले समय में हमें उनकी और और कहानियों का शिद्दत से इंतज़ार रहेगा। इनके लेखन की एक ख़ास बात और है कि वे क्वांटिटी की बनिस्बत क्वालिटी में यकीन रखती हैं और निरन्तर लेखन की किसी तरह की दौड़ में शामिल नहीं हैं और भीड़ से अलग रहना ही उनके व्यक्तित्व की भी विशिष्टता है। उनकी रचनाओं में क्षेत्रीयता और आंचलिकता की भीनी भीनी महक भी मिलती है जो उन्हें औरों से इतर खड़ा करती है। अतः इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि तबस्सुम जहां हिंदी साहित्य में एक उभरता हुआ नाम हैं। इनकी रचनाधर्मिता आगे आने वाले समय में हिंदी साहित्य में अभूतपूर्व योगदान देगी ऐसा मेरा विश्वास है। मुस्लिम महिला कथाकार होते हुए भी यह अपने समाज की विद्रूपताओं का बेबाक चित्रण करती हैं। तबस्सुम जहां ने एक बातचीत के दौरान मुझसे कहा था कि "सुहासिनी जी मैं साहित्य को हृदय के गहराई की उदभावना का मूर्त रूप मानती हूं। लेकिन इसे व्यक्त करने में कई उलझनों से गुजरना पड़ता है।एक स्त्री होने के नाते ख़ासकर मुस्लिम स्त्री होने के कारण कई चीज़ों को व्यक्त करना मुश्किल होता है। यह सामाजिक धार्मिक और आर्थिक आज़ादी न होने के कारण होता है। लेकिन हालात से लड़ना ही मेरा ध्येय है।" उनके इन विचारों से सृजनात्मक विसंगतियों का समझा जा सकता है। वह प्रगतिशील रही हैं यह उनके पारिवारिक संस्कारों की देन है। एक बार जब वह घरलू जरूरत के लिए पानी लेने मस्जिद में गई तो मौलाना ने यह कह कर मना कर दिया कि स्त्री का प्रवेश यहां नही हो सकता। अगली बार मौलाना जब चंदा मांगने उनके घर पहुंचे तब तबस्सुम ने चंदा देने से साफ मना कर दिया। इतनी छोटी उम्र में धर्म को लेकर ऐसा फ़ैसला प्रगतिशील होने के कारण ही वह ले सकी। युवा कथाकार के रूप में उनकी रचनात्मकता में जो धार दिखाई देती है वह अपने आसपास की विसंगतियों को हृदय से महसूस करने के कारण ही है।समाज से राजनीति तक और राजनीति से स्त्री जीवन तक जो विद्रूपताएं दिखाई देती है तबस्सुम जहां उसकी प्रबल विरोधी नजर आती हैं । इनकी कहानी का नायक जब संवाद बोलता है तो उसके संवाद में एक व्यंग्य मिश्रित ध्वनि स्पष्ट होती है यह उनके लेखन में अनुभूतियों के कारण ही है। स्त्री स्वयं में विसंगतियों से जूझती रहती है लेकिन इसके साथ उसका जीवन भी एक सृजनात्मक भावबोध में लिपटा रहता है अपने इसी क्षमता का उपयोग जो स्त्री कर लेती है वह स्वयं को साबित कर पाती है। तस्लीमा नसरीन से लेकर शाजिया तबस्सुम तक और शाजिया तबस्सुम से तबस्सुम जहां तक के कथा सृजन में सृजनात्मकता को पहचान कर पहचान बनाती स्त्री के भावगत उद्बोध का समझा जा सकता है। इतना अवश्य है कि अपने पूर्ववर्ती मुस्लिम साहित्यकारों के समान निर्दयता से यह विसंगतियों पर चोट नही करती हैं।बावजूद इसके इनके लेखन की धार हमारे भावनाओं को उद्देलित करने में सक्षम सिद्ध होती है। ___________________________________________________________________________ जीवन परिचय डॉ अल्पना सुहासिनी युवा आलोचक एवं समीक्षक हैं। देश विदेश की पत्र पत्रिकाओं में उनके लेख तथा ग़ज़ले निरंतर छपती रहती हैं। इनका ग़ज़ल संग्रह "तेरे मेरे लब की बात" काफ़ी चर्चित रहा है। साहित्य साधना के अलावा यह साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों व गोष्ठियों का सफल संचालन करती हैं। इसके अलावा बॉलीवुड एक्टर, उम्दा एंकर तथा एक मशहूर ग़ज़लकार भी हैं। 2011alpana@gmail.com अटैचमेंट क्षेत्र ग्वांतानामो बे की जेल से जब वह बाहर की दुनिया में आया तब उसे अहसास हुआ कि सीआईए और एफबीआई की अँधेरी दुनिया कैसी है !. (मेरी नयी प्रकाश्य पुस्तक 'जकड़न' शीघ्र आपके हाथों में (रंजन ज़ैदी')

बुधवार, 1 जुलाई 2020

Alpst-LITERATURE.com: नवगीत में लय-दोष...? / डॉ0 रंजन ज़ैदी

Alpst-LITERATURE.com: नवगीत में लय-दोष...? / डॉ0 रंजन ज़ैदी:   शिवबहादुर सिंह भदौरिया नवगीत में लय-दोष...?      Kumar Virendra         डॉ0 रंजन ज़ैदी            गीत रचना अपनी जगह है और रचना का आत्मप्रसा...कहते हैं कि 'गीत'  छंदों में सजाई आदमी की शब्दशः तस्वीर जैसा होता है ।  मेरे विचार से यह नज़रिया ही एकदम अलग है। ऐसा नहीं है कि जो कवि ने कह दिया या उसने  लिख दिया, वह 'नवगीत' हो गया। 

नवगीत में लय-दोष...? / डॉ0 रंजन ज़ैदी

 

शिवबहादुर सिंह भदौरिया
नवगीत में लय-दोष...?    
Kumar Virendra 

      डॉ0 रंजन ज़ैदी    

     गीत रचना अपनी जगह है और रचना का आत्मप्रसार दूसरी जगह। यहां उल्लेखनीय बात यह है कि जिन लोगों ने संवेद संकलन के लिए जीतोड़ मेहनत की, उन लोगों के पास गीत नहीं थे। उनकी रचना-प्रक्रिया या रचना-शक्ति बहुत कमज़ोर थी। चाहे वह ठाकुर प्रसाद सिंह हों या शंभूनाथ सिंह या चाहे राजेंद्र प्रसाद सिंह, या यूनिवर्सिटी में मेरे गुरु रहे प्रोफ़ेसर रवींद्र भ्रमर। 

    बात यह है कि नवगीत के उन्नायक, झंडाबरदार, पुरोहित, प्रणेता, नामकरण देने वाले या उसे

आगे चलाने वाले तो बहुत थे लेकिन तब उनके पास नवगीत संकलन नाममात्र के ही थे और वे अपने को निरंतर दोहराते रहते थे। कमाल की बात यह है कि ऐसे लोगों ने तब किसी संवेद-संकलन में आने का प्रयास भी नहीं किया था क्या हमें  यह अजीब सी बात नहीं लगती है?  

      सच्चाई यह है कि नवगीत में लय-दोष बहुत हैं। छंद की महत्ता इस माने में बढ़

कवि जगदीश जैन्ड 'पंकज' 
जाती है। हालांकि छंद चौथी स्थिति में आता है। पहले लय है, फिर गति है, फिर यति है। उसके बाद छंद की स्थिति है। यह स्थिति साहित्य में भी है और संगीत में भी। नवगीतकारों ने लय की गति को नहीं पकड़ा और न यह जाना कि गेय और अगेय गीत में लय को परिवर्तित करने वाले तत्व भी होते हैं। ऐसे गीतकारों ने गद्य को लय देने 

      राम सेंगर की कविता पर शुरू बहस में शामिल होते हुए कवि जगदीश जैन्ड 'पंकज' कहते हैं कि छान्दसिक कविता को हाशिये पर डालकर स्वयम्भू आलोचकों और कवियों द्वारा निर्धारित किये गए प्रतिमानों की निरर्थकता पर चोट करती सार्थक कविता लिखी है राम सेंगर ने।  (Read more at: https://yourstory.com/hindi/8eb9a7f63d-khair-khabar-of-khemke)

का प्रयास किया जो ठीक ऐसा ही था जैसे कोई पुराने  मशहूर फ़िल्मी गीत का रीमेक तैयार कर दे। कुछ गीतकारों ने इस भ्रम को तोड़ने का प्रयास किया और वे प्रयास सराहे भी गये हैं।  

       नवगीत के माध्यम साहित्य में बहुत बड़ी क्रांति कभी नहीं आई। जिस तरह के लोगों ने आंख, कान, नाक बंद कर तब नवगीत लिखे, उसी तरह लोग आज भी नवगीत लिख रहे हैं, लेकिन कोई भी गीत, कविता, कहानी या कोई अन्य विधा जब अपने समय-काल के चक्र को पूरा कर लेती है या कर लेता है तो उसके बाद उसका युग या काल बदल जाता है।   

       मिसाल के तौर पर जब हम पलटकर सन् 1974 के दौर की परिस्थितियों का अध्यनकर उसका आकलन करते हैं तो पाते हैं कि उस दौर के नवगीतकारों ने तत्कालीन परिस्थितियों की ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया था। हमें उन दिनों के जो नवगीत मिलते हैं, उनमें कुछ प्रेम की बात है, कुछ घर की तो कुछ प्रकृति की। लगता है मानो, कुछ कहने की जिजीविषा ही न बाकी रही हो। यह तो ऐसा था मानो खुद को कवि कहलाकर कुछ हासिल कर लेने का जबरन प्रयास हो। कविता तो स्वयं फूटती है, उसकी आमद होती है, हम उसे उर्दू  में 'नूजू़ल' कह सकते हैं।

    कारण यह है कि वो चाहे कविता हो या गद्य, चाहे और ज़िन्दगी का कोई क्रियाकलाप, लय के बिना कोई भी क्रिया संभव नहीं है। हर ध्वनि की एक रफ़्तार होती है। नवगीतकार रमेश रंजक को भी मेरी इस बात से गुरेज़ नहीं था। वह भी मानते थे कि हर रफ़तार की एक परख होती हैं। पारखी हिलते हुए हाथ की गति और घ्वनि को पहचान लेता है। इसी में लय की भी पहचान छुपी होती है।

      कोई मुझसे पूछे कि रेखांकन क्या है? तो मेरा जवाब होगा कि रेखांकन लय की एक धारा है जिसकी एक लकीर में गांधी जी जन्म ले लेते हैं और वही लकीर गीत के बोल को काट देती है। मेरी मान्यता यह है कि लय का अपना अलग अस्तित्व होता है। लय का इस्तेमाल जो जितना करेगा, वह उतना ही बड़ा कलाकार या फ़नकार बन जायेगा।   

       कहते हैं कि 'गीत'  छंदों में सजाई आदमी की शब्दशः तस्वीर जैसा होता है ।  मेरे विचार से यह नज़रिया ही एकदम अलग है। ऐसा नहीं है कि जो कवि ने कह दिया या उसने  लिख दिया, वह 'नवगीत' हो गया। 1974 के बाद से गीत में बदलाव आया है  जो धीरे-धीरे कालांतर में जनोन्मुखी हो गया। विचार करें तो हम पाएंगे कि तब देश का जनमानस एक तरह के परिवर्तन की मांग करने लगा था, 'नवगीत' उस आन्दोलन की अभिव्यक्ति बन गया और रूपकों व प्रतीकों की एक घुमावदार शैली का सहारा लेकर मार्चिंग-सांग मे तब्दील हो गया।

     तब की रचनाओं को पढ़कर हमें लगता है कि तत्कालीन युग करवट बदल रहा है। यह अहसास गलत भी नहीं था। स्वर्गीय जयप्रकाश नारायण एक तरह के राजनीतिक आन्दोलन का तब नेतृत्व कर रहे थे। उस काल के साहित्य और राजनीतिक ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि उसका समाज और राजनीति पर साफ़  प्रभाव दिखाई देता नज़र आता है। तब के आदमी को उसकी परिस्थितियों ने सड़क पर ला खड़ा किया था।

      ऐसे में कथित नवगीतकार प्रेम, प्रकृति और घर की बात कर पलायन का रास्ता अपना रहा था। यह बात अजीब सी नहीं लगती है? हां! यह बात सच है कि बदलते समय के साथ तब गीत भी बदलाव की मांग करता दिखाई देता रहा था  और फिर हम देखते हैं कि हुआ भी यह।

      गीत जन्मोन्मुखी होकर 1973 के उत्तरार्द्ध तक जन-गीत में बदल गया। इसलिए नवगीत चाहे कहीं से भी आया हो, लेकिन उसका अंतिम दौर 1973 तक ही रहा है। जब मैं 'सोन मछरिया मन बसी' (रविंद्र भ्रमर)  पढ़ता हूं या अन्य नवगीतकारों की कविताओं पर नज़र डालता हूं तो अंतर साफ नज़र आने लग जाता है। इसमें नई पीढ़ी के नवगीतकार भी परिवेशगत परम्परा के दबाओं से मुक्त नहीं हो पाये।

      जहां बचने की कोशिश दिखती है वहीं, गीत की मौखिक परम्परा का दबाव सामने आ जाता है। अच्छी बात यह है कि तुम्हारे गीतों में जहां एक ओर उत्तर छायावादी कवियों की गेय-परम्परा दिखाई देती है वहीं गीत अपने सौंदर्य-बोध की समझ को भी उजागर करते प्रतीत होते हैं।    

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शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

'भारतीय मुस्लिम अस्मिता' और 'राष्ट्रवादी मुस्लिम संगठन'

डॉ. रंजन ज़ैदी-लेखक 
ब अत्यंत भद्दी,  बदसूरत और मक्कार सूरतों वाले सियासी लोगों की आवाज़ें गली गलियारों से लेकर निजी मीडिया-चैनलों के पर्दों  पर भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तान भेज देने, बाबर, हुमायूँ की माँ-बहन की ऐसी-तैसी कर देने और खोखले राष्ट्रवाद के नाम पर प्रचारतंत्र बाइकों पर भगवे झंडे लहराता हुआ चोर-सिपाही का खेल खेलता हुआ कथित  हिंदूवाद  की दीवार की ओट के सहारे  दंगों की आग भड़काकर इतिहास व राजनीतिक दलों और समूचे जातिवाद को नसीहतें देने लग जाए तो समझ लेना चाहिए  कि चुनाव ने अवाम के दरवाज़ों पर दस्तकें देनी शुरू कर दी हैं. 


ब सियासी लोगों की आवाज़ें गली गलियारों से लेकर निजी मीडिया-चैनलों के पर्दों  पर भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तान भेज देने और खोखले राष्ट्रवाद के नाम पर नसीहतें देने लग जाए तो समझ लेना चाहिए  कि चुनाव ने दस्तकें देनी शुरू कर दी हैं. 

      उभरती नई राजनैतिक परिस्थितियों में दबे स्वरों से उभरते-उभरते अब खुलकर दो ऐसे सामाजिक मुस्लिम संगठन ('राष्ट्रवादी मुस्लिम संगठन' और 'भारतीय मुस्लिम अस्मिता') सामने आये हैं जो अपनी हेल्प-लाइनों के द्वारा देश के किसी भी क्षेत्र में धार्मिक चरमपंथियों द्वारा किये जा रहे हमलों, अत्याचारों और ज़्यादतियों के विरुद्ध सूचना पाते ही क़ानूनी कार्यवाई करने के लिए सक्रिय होने की तैयारी  कर चुके हैं. बताया जाता है कि इन दोनों सामाजिक संगठनों के स्वयंसेवी नियोजित रूप से पीड़ितों से मिलकर उन्हें तुरंत क़ानूनी सुरक्षा प्रदान करने की भी व्यवस्था करेंगे. इन संगठनों की क़ानूनी इकाइयों के सदस्य मुस्लिम समुदायों, दलितों  व पिछड़े वर्गों के आमजन में चेतना फैलाने के उद्देश्य से भारतीय संविधान में दिए गए अधिकारों की उन्हें पूरी जानकारियां उपलब्ध कराने  का भी काम करेंगीं।

      'राष्ट्रवादी मुस्लिम संगठन' के प्रवक्ता के अनुसार मुसलमानों की खामोशी को देश के धार्मिक चरमपंथियों ने उनकी कमज़ोरी समझा और एक के बाद एक करके वारदातें अंजाम देते चले गए. ताज़ा वारदातों में कासगंज दंगा भी एक है. मुसलमानो की ख़ामोशी को कमज़ोरी समझा गया जिससे लाभ उठाकर पुलिस-प्रशासन के सामने दंगाई वारदातें करते रहे. मुसलमानों के विरुद्ध दुष्प्रचार के माध्यम से भी और धार्मिक उन्माद के भीड़-तंत्र की आंड में भी उनका उत्पात हर तरफ जारी रहता है. हद यह हुई कि बीजेपी और आरएसएस के विभिन्न संगठनों के द्वारा भी मुसलमानों और इस्लाम के वैयक्तिक क़ानूनों पर हमले किये जाने लगे. तलाक़ से जुड़े क़ानून भी उनमें से एक है. जिसमें बताया गया कि तीन तलाक़ संविधान के खिलाफ है. AIMPLB यानि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड  के प्रवक्ता मौलाना सज्जाद नौमानी के













शनिवार, 2 दिसंबर 2017

‘भारतीय मुसलमान अपने वतन से प्यार करता है/मुनव्वर राना

जन्मदिन पर विशेष:‘भारतीय मुसलमान अपने वतन से प्यार करता है.

 'द वायर' से साभार 





Munawwar Rana
मुनव्वर राना की फेसबुक वॉल से साभार
ब पंडित नेहरू ने मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद से यह कहा था कि हम आपको रामपुर से खड़ा कर रहे हैं. मौलाना ने पूछा कि रामपुर से क्यों? नेहरू कहने लगे क्योंकि वो मुस्लिम बहुल क्षेत्र है. इस पर मौलाना ने कहा कि मैं वहां से खड़ा होना पसंद नहीं करूंगा. मैं हिंदुस्तान का लीडर हूं, मुसलमानों का लीडर नहीं हूं. फिर वे गुड़गांव, पंजाब से लड़े और जीतकर लोकसभा में आए थे.
अब हम ये नहीं कहते कि भाजपा ने लोकसभा या विधानसभा चुनाव में मुसलमानों को टिकट क्यों नहीं दिया? उन्होंने नहीं दिया या हो सकता है मांगने वाले गए ही न हों. अब अगर वे ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे का ख़्वाब सही में देखना चाहते थे तो ये होना चाहिए था कि पांच ऐसी सीटों से जो अल्पसंख्यकों की न हों, वहां से पांच मुसलमानों को जितवा कर सदन में पहुंचाते तो उत्तर प्रदेश में ही नहीं, पूरे मुल्क़ में उनकी इज़्ज़त बढ़ती. यह संदेश जाता कि पार्टी वाकई सबका विकास चाहती है. पार्टी की ग़लती ये नहीं है कि उसने मुसलमानों को टिकट नहीं दिया. पार्टी की ग़लती ये है कि उसे कुछ ऐसे उम्मीदवार जितवाने चाहिए थे जो मुसलमान होते लेकिन मुस्लिम बहुल सीट से न लड़कर ऐसी सीट से लड़ते जहां हिंदू या दूसरी क़ौमें रहती हैं.
एक तरफ़ तो भाजपा भी कहती है कि मुसलमानों का तुष्टीकरण हो रहा है, दूसरी तरफ़ वह मुसलमानों से दूरी बनाकर रखती है. जब मुसलमानों को आप साथ लेंगे ही नहीं तो कैसे मुसलमान आपके साथ आएंगे? 
मैंने साहित्य अकादमी अवार्ड लौटाया तो बार-बार ये कहा था कि मुल्क़ में 25 करोड़ मुसलमान हैं, इसको आप कहां फेंकेंगे? समंदर में फेंकेंगे तो समंदर सूख जाएगा. ज़मीन में बोएंगे तो ज़मीन छोटी पड़ जाएगी. इसलिए इसका हल यही है कि इनको अपने सीने से लगाइए. ‘मैं दुश्मन ही सही आवाज़ दे मुझको मुहब्बत से, सलीक़े से बिठाकर देख हड्डी बैठ जाती है.’
तो बात यह है कि भाजपा मुसलमानों का कुछ सीटों पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करके यह संदेश दे सकती थी कि उसके प्रति जैसा सोचा जाता है, वह वैसी नहीं है. इससे अच्छा संदेश जाता. एक पार्टी जो सत्ता में है, उसके लिए ये मुश्किल काम नहीं था. लेकिन वे योगी, साक्षी और इस तरह के लोगों को ज़ंजीर के बग़ैर खुला छोड़ देते हैं. हमने तो ये देखा है कि समाज में, घर में, आंगन में कोई भी आदमी ऐसी वैसी बात करता है तो उसे फ़ौरन डांट दिया दिया जाता है. मुहल्ले का कोई आदमी ऐसी बदतमीज़ी करता है तो सभी नाराज़ होते हैं. बजाय इसके कि ऐसे लोगों को डांट-फटकार कर बैठा दिया जाए, अचानक दो पागल क़िस्म के लीडर खड़े हो जाते हैं, बेवकूफ़ी भरे बयान देते हैं और आपकी राय ये होती है कि ये उनकी व्यक्तिगत राय हो सकती है. तो ऐसा व्यक्ति आपके पास क्यों है जो आपके ख़िलाफ़ राय दे रहा हो. इसका मतलब ये है कि आप ये चाहते ही हैं कि इस मुल्क़ में इत्तेहाद होने ही न पाए.
इतनी बड़ी जीत लेकर भारतीय जनता पार्टी आई थी, अगर वो चाहती तो सूरत बदल सकती थी. जब मैंने साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाया तो मुझे प्रधानमंत्री ने बुलाया था तो मैंने कहा कि मैं अकेले नहीं आऊंगा, और भी बड़े लोगों ने लौटाया है, उनको भी बुलाइए. मुझसे मीडिया ने पूछा कि अगर आप जाएंगे तो प्रधानमंत्री से क्या कहेंगे? हमने कहा, हम कोई बात नहीं करेंगे. हम प्रधानमंत्री का हाथ पकड़ेंगे और उनको दादरी ले जाएंगे. अख़लाक़ के घर के पास ले जाकर उनसे कहेंगे कि ‘काले कपड़े नहीं पहने है तो इतना कर ले, इक ज़रा देर को कमरे में अंधेरा कर ले.’ क्योंकि एक इंसान की मौत एक क़ौम की मौत है, एक क़ौम की मौत एक मुल्क़ की मौत है, एक मुल्क़ की मौत पूरी दुनिया की मौत है.
मैं एक शायर और एक हिंदुस्तानी की हैसियत से यही कहना चाहता हूं कि अगर ये चाहें तो सबको मुहब्बत करें और सब इनको मुहब्बत करें. लेकिन ये पूरे मुल्क़ पर हुक़ूमत करना ही नहीं चाहते. ये सिर्फ़ हिंदू पर हुक़ूमत करना चाहते हैं. लेकिन ऐसा होता नहीं है. हम अपने 65 बरस के तजुर्बे से कह सकते हैं कि ऐसी कोई भी हुक़ूमत इतिहास के पन्नों में नक़लीपन के साथ भले रह जाए, असल में वो ज़िंदा रहती नहीं है.
जैसी राजनीति भाजपा करती है उसका अंजाम ये हो सकता है कि हिंदुस्तान उतना ही रह जाएगा जितने को काउ बेल्ट कहते हैं. ये जो पांच छह सूबे हैं, यही हिंदुस्तान कहलाएगा. जो बंगाली है उसका बंगाल हो जाएगा. जो मद्रासी है उसका मद्रास हो जाएगा. जो असमिया है उसका असम हो जाएगा, जो गुजराती है उसका गुजरात हो जाएगा. बाक़ी हिंदुस्तान उतने ही नक़्शे में रह जाएगा जितने में काउ बेल्ट है. क्योंकि-----
 अगर आप एक क़ानून पूरे मुल्क़ में नहीं चला सकते तो ये तय है कि फिर आप पूरे मुल्क़ को एक नहीं रख सकते. आप गोवा में बीफ़ खाने की पूरी इजाज़त देते हैं, लेकिन वही बीफ़ खाता हुआ आदमी मुंबई एयरपोर्ट पर उतर जाए तो उसको 5 साल की सज़ा हो जाती है. इसका मतलब गोवा अलग मुल्क़ है और मुंबई अलग मुल्क़ है!
ये तय करना पड़ेगा कि यह पूरा एक मुल्क़ है या जो जहां जैसा चाहे वैसा मुल्क़ है! हमने तो जो नक़्शा देखा है वह तो यही है कि कश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक है लेकिन ये नारे लिखवाने से काम नहीं चलता.
इस देश में फिलहाल ऐसी कोई सियासी पार्टी नहीं है जो मुसलमानों को यह भरोसा दिला सके कि यह आपका मुल्क है और आप यहां सुरक्षित हैं. हालांकि, वोट के लिए सब ऐसा कहते हैं. लेकिन अगर ऐसा है तो पूरे मुल्क़ में एक बार इस पर भी वोटिंग करा ली जाए कि मुसलमानों को यहां रखना चाहिए या नहीं. तब उन लोगों को अफ़सोस होगा जो ऐसा चाहते हैं क्योंकि 80 प्रतिशत हिंदू कहेंगे कि नहीं, ये हमारे भाई हैं, हमारे जैसे हैं, यहीं पैदा हुए हैं, यहीं रहना है, यहीं जीना-मरना है. ये यहां का चांद देखकर नमाज़ पढ़ते हैं, यहां की ज़मीन पर सज़दा करते हैं, तो ये हमारे साथ यहीं रहेंगे. लेकिन ये जो सियासी लोग हैं ये अपने फ़ायदे के लिए कभी कह देते हैं कि ठीक है, कभी कह देते हैं कि नहीं ठीक है. चुनाव आता है तो दुकानें खुल जाती हैं, वोट बिकते हैं. क्या दाढ़ी वाला, क्या टोपी वाला, चोटी वाला, सबकी ख़रीद-फ़रोख़्त होती है.
यह बहुत मौजूं सवाल है कि आज मुसलमानों में मज़बूत लीडरशिप क्यों नहीं है. मेरे ख़्याल से लीडर मांएं नहीं जनतीं, लीडर क़ौमें ख़ुद पैदा कर लेती हैं. हालात लीडर पैदा करते हैं. लीडर बनने के लिए ऐतबार ज़रूरी है, लीडर वह हो सकता है जिसपर लोग ऐतबार करें. मुसलमानों के यहां सूरत-ए-हाल ये हो गई है कि ख़रीद-फ़रोख़्त ने लीडर नहीं बनने दिया. 
हम आपसे चाहे जैसी बात करें लेकिन मुझे कहीं का मेंबर बना दिया जाए, मुझे लाल बत्ती दे दी जाए तो हम बिक जाते हैं. इसलिए हमारे यहां लीडर नहीं पैदा हो पाए. हमने जब साहित्य अकादमी अवार्ड वापस किया था तब हमारी आंखों में वो इंक़लाब था, मेरे लहज़े में वो शफ़्फ़ाकी थी, मेरी आवाज़ में वो अंगारे थे कि 24 घंटे के अंदर मुझे हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री ने मिलने को बुला लिया. लेकिन हमने मना कर दिया. हमने कहा कि अवॉर्ड लौटाने वाले और भी लोग हैं जो ज्ञान में हमसे बड़े हैं, उम्र में हमसे बड़े हैं, उन्हें भी बुलाया जाए. अगर यही लोग कुछ दिन के लिए हमारे साथ खड़े हो जाते तो इस मुल्क़ में कोई भी फ़ैसला हो सकता था.
हम चीख़ते रहते हैं कि मुल्क़ में फ़िरक़ापरस्ती का क़ानून होना चाहिए कि जो पकड़ा जाए उसे उसके शहर से एक हज़ार किलोमीटर के फ़ासले पर जेल में रखा जाए. रातों-रात ये जो सोम और बालियान जैसे लीडर पैदा हो जाते हैं, वो इसलिए पैदा हो जाते हैं क्योंकि वे जेल जाते हैं तो उन्हें छुड़ाने के लिए पचास हज़ार लोग पहुंचते हैं तो वे रातों-रात हीरो हो जाते हैं. इसी तरह कोई मुसलमान ग़ैर-मुसलमान को मार देता है तो उसके साथ दस हज़ार मुसलमान खड़े हो जाते हैं. फिर वो मुसलमानों का लीडर बन जाता है.
भगवान एक बच्चा पैदा करने के लिए एक औरत की कोख़ उधार लेता है, नौ महीने इंतज़ार करता है तब एक बच्चा पैदा होता है. हमारे मुल्क़ में एक मुसलमान रात में एक हिंदू को मार दे तो सुबह वह मुसलमानों का लीडर बन जाता है. इसी तरह हिंदू रात में मुसलमान का क़त्ल कर दे तो सुबह हिंदुओं का लीडर हो जाता है. यह इस मुल्क़ के लिए मुफ़ीद नहीं है.
चुनाव में अगर कोई रिक्शेवाला खड़ा न हो सके, कुछ रुपये महीने पाने वाला पत्रकार न खड़ा हो सके, एक जूते गांठने वाला मोची न खड़ा हो सके तो चुनाव का कोई मतलब नहीं. 
यह तय होना चाहिए कि जिस आदमी की संपत्ति 25 लाख से ज़्यादा हो, वह चुनाव नहीं लड़ सकता. ये जो 15-20 करोड़ की संपत्ति वाले लोग चुनाव लड़ते हैं, ये उनकी वो रक़म है जो वे काग़ज़ पर दिखाते हैं. आयकर विभाग छापा मारता है तो कहता है कि हमने नौ करोड़ पकड़े, इसका मतलब है कि वह नब्बे करोड़ का आदमी होगा. ये चुनाव और जम्हूरियत बस पैसे वालों का खेल बनकर रह गया है. हमारे ज़माने में मंत्री तक एक टूटी-फूटी जीप में चलते थे. आज तो सभासद भी करोड़ों की गाड़ी में चलता है. बंद एसी गाड़ी में चलने वाले मंत्री को मालूम ही नहीं है कि नंगे पांव चलने वालों की परेशानी क्या होती है.
मैं यह लिखना चाहता हूं कि इस मुल्क़ की आबादी 130 करोड़ है. सौ करोड़ यहां पर जानवर रहते हैं. तीस करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके खाने-पीने, दवा, शिक्षा आदि की व्यवस्था है. सौ करोड़ लोग ऐसे है जिनके खाने-पीने, दवा, शिक्षा, आवास आदि का कुछ ठीक नहीं है. ये जानवरों की तरह जी रहे हैं. आप जानवरों को भी वोटरों में शामिल कर लेते हैं. इसका मतलब आपको गिनती नहीं आती. आप जानवरों को इंसानों में शामिल कर रहे हैं या फिर इंसानों को जानवरों में शामिल कर रहे हैं.
हम तो यही चाहेंगे कि शासन कोई करे, लेकिन हमारा मुल्क़ बचा रहे. उसे नेता चलाए, सेना चलाए, औरत चलाए, मर्द चलाए, लेकिन मुल्क़ सुरक्षित होना चाहिए. हर आदमी सुरक्षित होना चाहिए. इस देश का मुसलमान कभी नहीं कहता कि हमको कोई दाढ़ी वाला प्रधानमंत्री लाकर दे दीजिए. आज़ादी के बाद जिन्ना की वजह से मुसलमान इस बात से अलर्ट हो गया कि उसका लीडर हिंदू ही है. 
ये जो झोलाछाप ओवैसी वगैरह हैं, ये तो वोटकटवा हैं, बकौल लालू प्रसाद यादव. ये सिर्फ़ मुसलमान का वोट काटकर किसी को जितवा देते हैं. इनको इसी बात का पैसा मिलता है. कोई जाहिल मुसलमान भी नहीं कहताकि उसे मुसलमान प्रधानमंत्री चाहिए. वह तो सिर्फ़ यह चाहता है कि दंगे न हों. बिहार में मुसलमानों ने नीतीश की सरकार बनाई तो उसे विश्वास है कि वे दंगा नहीं होने देंगे. यूपी में आज मुसलमान मायावती की तरफ़ देख रहे हैं क्योंकि उनको यह पता है कि मायावती के शासन में दंगा नहीं होता.
अब आज हालत यह है कि कोई झूठा मसला होता है बस अख़बार में छप जाता है कि फलां आदमी आतंकवादी है, इसके तार वहां से हैं, इसको इतना पैसा आया है. उसे पकड़ कर बंद कर देते हैं. सब मान लेते हैं कि वह आतंकवादी है. इस देश की दशा इतनी ख़राब है कि अगर आज पुलिस मुझे पकड़ ले कि यह आतंकवादी है तो लोग मान लेंगे कि हां यह आतंकवादी होगा. जब 12 बरस बाद हमको छोड़ा जाएगा तब तक हम अपने पांव पर चलने लायक नहीं बचेंगे. ऐसा सैकड़ों नौजवानों के साथ हो चुका है. क़ानून यह होना चाहिए कि जब आप किसी को 12 बरस या 20 बरस बाद बेक़सूर कहकर छोड़ रहे हैं तो उसे 50 करोड़ का हर्ज़ाना भी देना चाहिए.
पुलिस एक 18 बरस के लड़के को पकड़ती है, फिर उसे 20 साल बाद बूढ़ा करके छोड़ देती है कि यह निर्दोष है. तब तक उसका परिवार बर्बाद हो चुका होता है. जब यहां ऐसा क़ानून चलता है तो यह मुल्क़ तो नहीं हुआ, यह तो तहख़ाना हो गया. अगर इस तहख़ाने को हम ठीक नहीं करेंगे तो यह सबके लिए नुकसान करेगा.
यहां पर किसी भी मुसलमान को कह देते हैं कि पाकिस्तानी है. अरे आप अरबी कह दीजिए तो हम मान भी लें कि हां, अरब से आए थे. पैदल चल के आए थे. पाकिस्तान से हमारा क्या लेना देना? पाकिस्तान तो जितना हमारा है, उतना ही आपका है. वह तो हिंदुस्तान का हिस्सा था. हमें आप पाकिस्तानी क्यों कहेंगे? अगर हम पाकिस्तानी हैं तो आप पहले पाकिस्तानी हैं. यह बेहद अफ़सोस की बात है. हम तो इस मुल्क़ को मादरे-वतन कहते ही हैं. हमारा मुल्क़ तो ये है ही, हमारी मां भी यही है. यह मां का वतन है और मुसलमान इस मुल्क़ से बेपनाह मोहब्बत करते हैं.
(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत/इंद्रेश कुमार

गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत/इंद्रेश कुमार

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

मानस की खोज में मनुष्य को तलाशता कथाकार ‘मंटो/’रंजन ज़ैदी


मानस की खोज में मनुष्य को तलाशता कथाकार ‘मंटो’
मनुष्य को तलाशता कथाकार ‘मंटो’

   सादत हसन मंटो का जन्म ११ मई,१९१२  में लुधियाना, पंजाब के गांव संबराला में हुआ था जबकि उनकी मृत्यु १८ जनवरी,१९५५ को लाहौर में हुई. 

          मंटो ने उर्दू साहित्य की अनेक विधाओं पर कार्य किया है जिसमें रेखा-चित्र, अनुवाद, नाटक और फिल्मों के लिए कहानियां, उल्लेखनीय हैं. यही नहीं बल्कि उन्होंने फिल्मों में भी अभिनय किया, लेकिन वे अभिनेता के रूप में सफल नहीं हुए.

          उर्दू साहित्य में शोध करने वाली अधिकतर छात्राएं मंटो के साहित्य पर शोध करने से सदैव कतराती रहती थीं.  बताते हैं कि पाकिस्तान में आज भी महिला छात्राएं उर्दू साहित्य में मंटो पर शोध नहीं करना चाहती हैं, लेकिन कमाल की बात यह है कि एक कथाकार के रूप में वह आज भी शोधार्थियों की अव्वल पसंद में शुमार किये जाते हैं.
                                                                         ---------------------------                                                                                                           
सादत हसन मंटो को हिंदी-उर्दू साहित्य में एक ऐसे कथाकार के रूप में लिया जाता है जिसने समाज के आम किरदारों की आवाज़ बनकर अपने अफसानों में ज़िन्दगी भर ज़िंदा रखा और वही अफ़साने उसके दिवंगत हो जाने के बाद अपने रचनाकार को आज भी ज़िंदा रखे हुए हैं.
      कहा जाता रहा है कि मंटो अश्लील कथाकार है. संयोग से यह आरोप भी पहली बार तत्कालीन प्रगतिशील साहित्यकारों ने ही लगाया था. जब कि मंटो अपने समय के समाज की आवाज़ बनकर हुक्मरानों को ऐसे मर्सिये सुना रहा था जिसमें तत्कालीन सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था से जन्म लेता दुःख, राजनितिक शोषण, असमानता, सांप्रदायिक-हिंसा, बलात्कार और भ्रष्टाचार की धुनें थीं और अश्लील कहे जाने वाले अफसानों की पोनोग्राफी भी.
          शायद इसीलिए उर्दू साहित्य के बड़े आलोचकों में शुमार किये जाने वाले आलोचक अज़ीज़ अहमद ने मंटो की कहानी धुंआ को खट्टी डकार की उपमा दी.  उनकी दृष्टि में उनके द्वारा लिखे गए अफसानों से तत्कालीन युवा-पीढ़ी सेक्स को एक तरह के शारीरिक-रोग के रूप में लेते हुए उससे विरक्त होने लगी थी जब कि कहानीकार के रूप में अज़ीज़ अहमद ने खुद अपने अफसाने अंगारे और शोले में सेक्स का भरपूर इस्तेमाल किया है. यही नहीं, मंटो के समकालीन अली सरदार जाफ़री ने तो उनके साथ कदमताल करते हुए भी अपनी पुस्तक प्रगतिशील साहित्य में मंटों को अश्लील साहित्य लिखने पर फटकार तक लगाई है.
          प्रगतिशील आलोचक की यह फटकार मेरी दृष्टि में सही नहीं है क्योंकि मंटो तत्कालीन समाज में व्याप्त शोषण के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे थे जिसमें तनिक भी किसी भी तरह की राजनीति शामिल नहीं थी. उनकी कहानियों में सीधे उस आम इंसान के दर्द को उकेरा गया है जिसे शारीरिक हिंसा करने के लिए बाध्य किया जाता है. दूसरी ओर धार्मिक-आवरण की परतों की ओट में रहकर अनिच्छायी स्त्री-पुरुष को एक साथ मर्यादाओं के साथ बलात दाम्पति-जीवन जीते रहने के लिए बाध्य करते रहना भी किसी तरह से धर्मांध-सामाजिक शोषण की परिधि से अलग नहीं माना जा सकता है.
          मंटो का नज़रिया साफ़ था.  उसकी कहानियों के किरदार बदरू और मोरनियां के रूप में हर शहर में आसानी से देखे जा सकते हैं जो शहर की गंदिगी को बाहर ले जाते हैं. मंटो के अनुसारहम अपने संगेमरमर के गुसलखानों की बात कर सकते हैं, अगर हम साबुन और लैवेंडर की बात कर सकते है तो इन मोरियों और बदरुओं की बात क्यों नहीं कर सकते जो हमारे बदन का मैल पीती हैं?’ इस वक्तव्य से ही मंटो की सोच और उसकी कद्दावर हैसियत का पता चल जाता है.
          इसी समाज से उठाये हुए मोज़ेल, शारदा और कुलसूम जैसे किरदार मंटो जैसे कथाकार के कद को और भी ऊंचा उठा देते हैं. ठंडा गोश्त की वहशत, उसका मनोविज्ञानिक प्रस्फुटन और तत्कालीन सांप्रदायिक हिंसा के थरथराते ह्यूले जिस तरह के बिम्बों के साथ कहानी के अंधेरों से बगूलों की तरह निकलते और फटते हैं, उनका चित्रण मंटो जैसा कथाकार ही कर सकता था और उसने उस भयानक त्रासदी की उलटी करके दिखाया भी. ऐसी उलटी कि जिसकी दुर्गन्ध से इंसानियत को भी घिन आने लगे. मंटो द्वारा उन्हीं दिनों होते रहने वाले सांप्रदायिक दंगों पर लिखे गए इस जैसे और भी अफसानों में इसी तरह की विवशता की प्रस्तुति मानव-मूल्यों को शर्मसार करने के लिए काफी है- 
      नका पहला कहानी संग्रह आतिश पारे १९३६ में लाहौर से प्रकाशित हुआ था. सस्ते और अश्लील साहित्य कहे जाने वाले अफसानों में सरदार टोबाटेक सिंह, ठंडा गोश्त, नंगी आवाज़ें, आखिरी सियालकोट, खाली बोतले-खाली डिब्बे, काली शलवार, खोल दो,  नया कानून, लाइसेंस, ब्लाउज़ और अनारकली जैसे अफसाने आज भी बुद्धिजीवियों के बीच बहस के विषयों को जन्म  देते रहते हैं. अपने समय में इन्हीं अफसानों को चोरी-छुपे पढ़-पढ़कर इलीट-वर्ग चटखारे लिया करता था लेकिन कालांतर में यही पाठक-वर्ग स्वीकारने लगा कि मंटो यथार्थवादी कथाकार है कि सतही अश्लील साहित्य का सर्जक. इसके बावजूद मंटो के विरुद्ध कानूनी प्रशासनिक कार्यवाइयां हुईं. उन्हें मुकदमों के फैसलों में दण्डित किया गया.
          डीएच. लारेंस के उपन्यास लेडी चैटर्लीज़ लवर  के प्रकाशन और उसके वितरण पर इंग्लैण्ड और अमेरिका में काफी समय तक रोक लगी रही जब कि ऐसा नहीं होना चाहिए था. यूँ देखा जाये तो लेखक के जीवन-काल में ही उपन्यास लेडी चैटर्लीज़ लवर के कई अंश पहले ही प्रकाशित हो चुके थे. तब कोई भूचाल नहीं आया था लेकिन उसकी मृत्योपरांत लगभग ३० वर्षों बाद जब पूरा उपन्यास प्रकाशित हुआ तो अमेरिका और ब्रिटेन में हड़कम्प मच गया. तब कोई भी व्यक्ति यह अनुमान नहीं लगा सकता था कि कालांतर में यही उपन्यास अपनी स्थिति में एक कालजयी उपन्यास साबित हो जायेगा।
          यही स्थिति यूलिसिस उपन्यास की रही. उसे भी अश्लीलता के खेमे में घेरकर अदालत के कटघरे में पहुँचाया गया, मुक़दमे चले लेकिन फिर समय आने पर उस उपन्यास को भी पाठकों ने अपने सीने से लगा लिया। वास्तविकता यह है कि अश्लीलता की परिभाषा समय और काल में बदलती देखी गई है. ढाई हज़ार साल पहले  काम-सूत्र के रचयिता वात्स्यायन पर भी अश्लील साहित्यकार होने की मुहर लगाई गई थी लेकिन वही ग्रन्थ कालांतर में कालजयी सिद्ध हुआ.
          फोर्ट विलियम कालेज द्वारा प्रकाशित कहानी तोता को भी अश्लील कहानियों में शुमार किया जाता है लेकिन इसके बावजूद हम उसे अश्लील कहानी साबित नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि अभी तक हम यही साबित नहीं कर पाये हैं कि अन्त्ततः अश्लीलता है क्या और कैसे इसे परिभाषित किया जा सकता है.
          देखा जाये तो जो कानून ईस्ट इंडिया कंपनी ने १८५६ में ऑब्सीन बुक्स ऐंड पिक्चर्स ऐक्ट के नाम से बनाया था, वही कानून आज़ादी के बाद भारतीय संविधान ने इंडियन पीनल कोड में शामिल कर लिया जिसके तहत काली शलवार, बू और धुंआ जैसी अश्लील कहानियों के लेखक सादत हसन मंटो पर तत्कालीन इंडियन पीनल कोड के तहत मुक़दमे चलाये गये.
          मंटो की कहानियों के पात्रों में सेक्स-वर्कर  हमारी आर्थिक सामाजिक-व्यवस्था के मूल केंद्र में  प्रतीक के रूप में नज़र आती है. मतलब यह कि आज़ादी के बाद भी समूचा देश आर्थिक भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था के पतनोन्मुखी रवैये के कारण आज भी बेहद पिछड़ा हुआ है जो तमाम योग्यताओं, अनुभवों और प्रतिभाओं के बावजूद अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं है. कमोबेश यही स्थिति सेक्स-वर्कर की है जो जीवन की मूलभूत आवश्यक्ताओं तक को पूरा करने के लिए तरसती रहती हैं.
          मंटो ने अपने किसी भी अफ़साने में उनके पात्रों को किसी विशेष पार्टी या राजनीतिक एजेंडे का वालिंटियर बनने की अनुमति नहीं दी. यहाँ तक कि जब वह सपरिवार भारत से पाकिस्तान गए तो वहाँ भी उनके दृष्टिकोण में किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं आया. शायद इसीलिए पाकिस्तान में मुहम्मद हसन असकरी और वारिस अलवी जैसे उर्दू साहित्य के नामवर आलोचकों ने भी मंटो के साहित्य को गम्भीरता से नहीं लिया।
          अजीब बात यह है कि मंटो खुद से पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे लेकिन उनका परिवार एक खुशहाल सपने को साकार करने का उत्स लिए वहाँ पहुंचकर एक नई ज़िन्दगी की शुरूआत करना चाहता था. स्वप्न का दुखद पहलू यह था कि मंटो का परिवार यह स्वप्न उस समय देख रहा था जब बटवारे के धुएं में सरदार टोबाटेकसिंह भारत-पाक की अजानी सरहद पर अपने खेत तलाशने में विभाजन की अदृश्य लकीरों पर दौड़ रहा था, कभी इधर तो कभी उधर. उसे तब दोनों तरफ बेचे जा रहे ठन्डे गोश्त की भयानक दुर्गन्ध महसूस हो रही थी. वहीं काली शालवारों की खुलती गांठे गिनी जा रही थीं. दरयाए-चिनाब और झेलम की तेज़ धाराओं को पारकर वफादार जानवर अपनी  अंतिम उखड़ती सांसों की कड़ियाँ पकड़े अपने मालिकों को उदास नज़रों से देखते हुए दम तोड़ रहे थे और बवंडर की महामारी की खबरें मंटो को पल-प्रतिपल घोर निराशा की फिसलन पर सरकाती जा रही थी.
          कैसा अजीब संयोग था कि जब बवंडर के गुज़र जाने की खबर आई तो मंटो इस दुनिया से ही रुखसत हो गया लेकिन कौन बताये कि वह मृत्यु तो पदार्थ की थी, कहानीकार मंटो तो आज भी हमारे बीच किताबों के पन्नों पर करवटें लेती कालजयी रचनाओं की दुनियां में ज़िंदा है.
                    ५६ वर्ष बाद पाकिस्तान को याद आया कि उनके मुल्क में कोई उर्दू का बहुत बड़ा कथाकार सादत हसन मंटो है जिसे भारत के अदीबों और वहाँ के अदब में भी इज़ज़त की निगाह से देखा जाता है और जिसने प्रकाशित-अप्रकाशित लगभग ३२५ कहानियां लिखी हैं. क्यों उसे निशाने-इम्तियाज़ सम्मान से सम्मानित किया जाये? यह सम्मान उन्हें इसलिए दिया गया कि भारत की  विभिन्न साहित्यिक-संस्थाएं मंटो को सम्मानित कर रही थीं. पाकिस्तान शर्मिंदा था कि उससे ऐसी भूल कैसे हो गई? पाकिस्तानी मंटो अगर इतना बड़ा रहा है तो उसे भी पाकिस्तान में सम्मानित किया जाना चाहिए था. पाकिस्तान के ब्रांडेड-फ़तवा कम्पनियाँ उन्हें कम्युनिस्ट मानती रहीं और मृत्यु के बाद भी वही कम्पनियां उन्हें कम्युनिस्ट मानती रही हैं लेकिन वे आजतक यह बात नहीं समझ पाईं कि मंटो एक सच्चा, ईमानदार मानस कथाकार था.
          मंटो ने लिखा भी कि मृत्यु के बाद उनकी कब्र के कत्बे पर भले ही उनके कम्युनिस्ट होने का मैडल चस्पा कर दिया जाये लेकिन यह बात जान लेना ज़रूरी है कि इस कब्र में कौन दफन है, वो कि जो पाकिस्तान का एक आम शहरी मुसलमान था. या वो जो मज़हब के जुनूनियों से दूरियां बनाकर खुद को हरेक वाद से मुक्त रखना चाहता था. सच्चाई को गहराइयों तक देखने-परखने और बुरों को  लगाने तक का हौसला रखता था, या वो मंटो जो दो-कौमी नज़रियों की राजनीति का समर्थक था. कथाकार मंटो का तो वाक्य यही हो सकता था कि इस कब्र में वह दफन है, जो कथाकार सादत हसन मंटो के नाम से जाना जाता है, जिसने  जीवन भर अपने अफसानों के माध्यम से मानस की खोज में मनुष्य को तलाश किया.
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          पाकिस्तान की उर्दू शायिरा किश्वर नाहीद अपने संस्मरण में बताती हैं कि जब वह सातवीं जमात में थीं तब उन्होंने मंटो की कहानी ठंडा गोश्त  पढ़ी थी.

          उन दिनों मंटो की कहानियां शरीफ घरानों में औरतें लुक-छुपकर पढ़ा करती थीं. उन्ही कहानियों में ठंडा गोश्त भी थीकिश्वर नाहीद मंटो की इस या इस जैसी दूसरी कहानियों पर अपने घर में औरतों के मुंह से अक्सर बातें सुनतीं तो उसे बड़ा अजीब सा लगता. उसने भी ठंडा गोश्त पढ़ा लेकिन समझ में नहीं आया कि इस कहानी में ऐसा क्या है जिसके कारण घर में औरतें इसका ज़िक्र किया करती है. मासूम ज़हन में सवाल उठा तो भाई से जवाब की उम्मीदें भी बंध गईं.

          भाई से जब जानना चाहा तो उन्होंने बहन के गाल पर ऐसा ज़न्नाटेदार थप्पड़ जड़ा कि आँखों के सामने अँधेरा सा छा गया. कानों में भाई की हिदायत गूंजने लगी कि  आइंदा वह  घर में मंटों की  कहानियां पढ़ती नज़र आयें. 

इस  घटना के बाद तो मंटो किश्वर नाहीद के मन-मस्तिष्क में ऐसा बसे कि बड़े  होने तक उनकी हर कहानी किश्वर नाहीद की निगाहों के सामने से गुज़रती चली गई. नाहीद को बड़ा होने पर ही मालूम हुआ कि भाई ने बचपन में उसे थप्पड़ क्यों मारा था.
Copyright : Ranjan Zadi