बुधवार, 1 जुलाई 2020

नवगीत में लय-दोष...? / डॉ0 रंजन ज़ैदी

 

शिवबहादुर सिंह भदौरिया
नवगीत में लय-दोष...?    
Kumar Virendra 

      डॉ0 रंजन ज़ैदी    

     गीत रचना अपनी जगह है और रचना का आत्मप्रसार दूसरी जगह। यहां उल्लेखनीय बात यह है कि जिन लोगों ने संवेद संकलन के लिए जीतोड़ मेहनत की, उन लोगों के पास गीत नहीं थे। उनकी रचना-प्रक्रिया या रचना-शक्ति बहुत कमज़ोर थी। चाहे वह ठाकुर प्रसाद सिंह हों या शंभूनाथ सिंह या चाहे राजेंद्र प्रसाद सिंह, या यूनिवर्सिटी में मेरे गुरु रहे प्रोफ़ेसर रवींद्र भ्रमर। 

    बात यह है कि नवगीत के उन्नायक, झंडाबरदार, पुरोहित, प्रणेता, नामकरण देने वाले या उसे

आगे चलाने वाले तो बहुत थे लेकिन तब उनके पास नवगीत संकलन नाममात्र के ही थे और वे अपने को निरंतर दोहराते रहते थे। कमाल की बात यह है कि ऐसे लोगों ने तब किसी संवेद-संकलन में आने का प्रयास भी नहीं किया था क्या हमें  यह अजीब सी बात नहीं लगती है?  

      सच्चाई यह है कि नवगीत में लय-दोष बहुत हैं। छंद की महत्ता इस माने में बढ़

कवि जगदीश जैन्ड 'पंकज' 
जाती है। हालांकि छंद चौथी स्थिति में आता है। पहले लय है, फिर गति है, फिर यति है। उसके बाद छंद की स्थिति है। यह स्थिति साहित्य में भी है और संगीत में भी। नवगीतकारों ने लय की गति को नहीं पकड़ा और न यह जाना कि गेय और अगेय गीत में लय को परिवर्तित करने वाले तत्व भी होते हैं। ऐसे गीतकारों ने गद्य को लय देने 

      राम सेंगर की कविता पर शुरू बहस में शामिल होते हुए कवि जगदीश जैन्ड 'पंकज' कहते हैं कि छान्दसिक कविता को हाशिये पर डालकर स्वयम्भू आलोचकों और कवियों द्वारा निर्धारित किये गए प्रतिमानों की निरर्थकता पर चोट करती सार्थक कविता लिखी है राम सेंगर ने।  (Read more at: https://yourstory.com/hindi/8eb9a7f63d-khair-khabar-of-khemke)

का प्रयास किया जो ठीक ऐसा ही था जैसे कोई पुराने  मशहूर फ़िल्मी गीत का रीमेक तैयार कर दे। कुछ गीतकारों ने इस भ्रम को तोड़ने का प्रयास किया और वे प्रयास सराहे भी गये हैं।  

       नवगीत के माध्यम साहित्य में बहुत बड़ी क्रांति कभी नहीं आई। जिस तरह के लोगों ने आंख, कान, नाक बंद कर तब नवगीत लिखे, उसी तरह लोग आज भी नवगीत लिख रहे हैं, लेकिन कोई भी गीत, कविता, कहानी या कोई अन्य विधा जब अपने समय-काल के चक्र को पूरा कर लेती है या कर लेता है तो उसके बाद उसका युग या काल बदल जाता है।   

       मिसाल के तौर पर जब हम पलटकर सन् 1974 के दौर की परिस्थितियों का अध्यनकर उसका आकलन करते हैं तो पाते हैं कि उस दौर के नवगीतकारों ने तत्कालीन परिस्थितियों की ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया था। हमें उन दिनों के जो नवगीत मिलते हैं, उनमें कुछ प्रेम की बात है, कुछ घर की तो कुछ प्रकृति की। लगता है मानो, कुछ कहने की जिजीविषा ही न बाकी रही हो। यह तो ऐसा था मानो खुद को कवि कहलाकर कुछ हासिल कर लेने का जबरन प्रयास हो। कविता तो स्वयं फूटती है, उसकी आमद होती है, हम उसे उर्दू  में 'नूजू़ल' कह सकते हैं।

    कारण यह है कि वो चाहे कविता हो या गद्य, चाहे और ज़िन्दगी का कोई क्रियाकलाप, लय के बिना कोई भी क्रिया संभव नहीं है। हर ध्वनि की एक रफ़्तार होती है। नवगीतकार रमेश रंजक को भी मेरी इस बात से गुरेज़ नहीं था। वह भी मानते थे कि हर रफ़तार की एक परख होती हैं। पारखी हिलते हुए हाथ की गति और घ्वनि को पहचान लेता है। इसी में लय की भी पहचान छुपी होती है।

      कोई मुझसे पूछे कि रेखांकन क्या है? तो मेरा जवाब होगा कि रेखांकन लय की एक धारा है जिसकी एक लकीर में गांधी जी जन्म ले लेते हैं और वही लकीर गीत के बोल को काट देती है। मेरी मान्यता यह है कि लय का अपना अलग अस्तित्व होता है। लय का इस्तेमाल जो जितना करेगा, वह उतना ही बड़ा कलाकार या फ़नकार बन जायेगा।   

       कहते हैं कि 'गीत'  छंदों में सजाई आदमी की शब्दशः तस्वीर जैसा होता है ।  मेरे विचार से यह नज़रिया ही एकदम अलग है। ऐसा नहीं है कि जो कवि ने कह दिया या उसने  लिख दिया, वह 'नवगीत' हो गया। 1974 के बाद से गीत में बदलाव आया है  जो धीरे-धीरे कालांतर में जनोन्मुखी हो गया। विचार करें तो हम पाएंगे कि तब देश का जनमानस एक तरह के परिवर्तन की मांग करने लगा था, 'नवगीत' उस आन्दोलन की अभिव्यक्ति बन गया और रूपकों व प्रतीकों की एक घुमावदार शैली का सहारा लेकर मार्चिंग-सांग मे तब्दील हो गया।

     तब की रचनाओं को पढ़कर हमें लगता है कि तत्कालीन युग करवट बदल रहा है। यह अहसास गलत भी नहीं था। स्वर्गीय जयप्रकाश नारायण एक तरह के राजनीतिक आन्दोलन का तब नेतृत्व कर रहे थे। उस काल के साहित्य और राजनीतिक ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि उसका समाज और राजनीति पर साफ़  प्रभाव दिखाई देता नज़र आता है। तब के आदमी को उसकी परिस्थितियों ने सड़क पर ला खड़ा किया था।

      ऐसे में कथित नवगीतकार प्रेम, प्रकृति और घर की बात कर पलायन का रास्ता अपना रहा था। यह बात अजीब सी नहीं लगती है? हां! यह बात सच है कि बदलते समय के साथ तब गीत भी बदलाव की मांग करता दिखाई देता रहा था  और फिर हम देखते हैं कि हुआ भी यह।

      गीत जन्मोन्मुखी होकर 1973 के उत्तरार्द्ध तक जन-गीत में बदल गया। इसलिए नवगीत चाहे कहीं से भी आया हो, लेकिन उसका अंतिम दौर 1973 तक ही रहा है। जब मैं 'सोन मछरिया मन बसी' (रविंद्र भ्रमर)  पढ़ता हूं या अन्य नवगीतकारों की कविताओं पर नज़र डालता हूं तो अंतर साफ नज़र आने लग जाता है। इसमें नई पीढ़ी के नवगीतकार भी परिवेशगत परम्परा के दबाओं से मुक्त नहीं हो पाये।

      जहां बचने की कोशिश दिखती है वहीं, गीत की मौखिक परम्परा का दबाव सामने आ जाता है। अच्छी बात यह है कि तुम्हारे गीतों में जहां एक ओर उत्तर छायावादी कवियों की गेय-परम्परा दिखाई देती है वहीं गीत अपने सौंदर्य-बोध की समझ को भी उजागर करते प्रतीत होते हैं।    

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